रांची: इस्लामी कैलेंडर का नौवां और सबसे पवित्र महीना ‘रमज़ान उल मुबारक’ अपने साथ रहमतों और बरकतों की सौगात लेकर आता है। दुनिया भर में इसे इबादत के “मौसम-ए-बहार” के रूप में मनाया जाता है, लेकिन इसकी गहराई केवल खान-पान के परहेज तक सीमित नहीं है। यह महीना दरअसल एक वार्षिक ट्रेनिंग कैंप है, जो इंसान को आत्मसंयम, त्याग और सामाजिक न्याय का पाठ पढ़ाता है।

अल्लाह की चेतना और तकवा
पवित्र कुरआन के अनुसार, रोज़े का असली उद्देश्य इंसान के भीतर ‘तकवा’ यानी ईश्वर-चेतना पैदा करना है। यह वह अहसास है जो व्यक्ति को अकेले में भी गलत काम करने से रोकता है। हालांकि उपवास की परंपरा हिंदू, ईसाई और यहूदी धर्मों में भी विभिन्न रूपों में देखी जाती है, लेकिन रमज़ान का स्वरूप आध्यात्मिक और सामाजिक संतुलन का एक अनूठा संगम है।

कुरआन और शबे-कद्र का महत्व
रमज़ान की तैयारी शाबान महीने से ही शुरू हो जाती है। इसी माह में मानवता के मार्गदर्शन के लिए ‘कुरआन शरीफ़’ का अवतरण हुआ था। इस महीने की एक रात ‘लैलतुल क़द्र’ (शबे-क़द्र) को हजार महीनों की इबादत से भी बेहतर माना गया है, जिसमें मांगी गई हर जायज दुआ कुबूल होती है।

डॉ जमाल अहमद, सदस्य, झारखंड लोक सेवा आयोग

भूख का एहसास और सामाजिक न्याय
रमज़ान का सबसे बड़ा मानवीय संदेश ‘सहानुभूति’ है। जब एक संपन्न व्यक्ति दिन भर भूखा-प्यासा रहता है, तो उसे उस गरीब की तकलीफ का वास्तविक अनुभव होता है जिसे दो वक्त की रोटी नसीब नहीं होती। यही एहसास समाज में समानता लाता है। इसी कारण इस्लाम में जकात (दान), सदक़ा और फ़ित्रा पर विशेष ज़ोर दिया गया है, ताकि ईद की खुशियों में समाज का अंतिम व्यक्ति भी शामिल हो सके। यह एक ऐसी व्यवस्था है जो समाज में धन के केंद्रीकरण को रोककर आर्थिक संतुलन बनाए रखती है।

सेहत और अनुशासन का संगम
धार्मिक पहलू के साथ-साथ, रोज़ा स्वास्थ्य के लिए भी वरदान है। यदि सेहरी और इफ्तार में अनुशासन का पालन किया जाए, तो यह शरीर के ‘डिटॉक्सिफिकेशन’ (सफाई) में मदद करता है और मेटाबॉलिज़्म को सुधारता है। संक्षेप में, रमज़ान खुद को बदलने का नाम है। यह गुस्सा छोड़ने, ज़ुबान पर काबू रखने और नफ़रत मिटाने का महीना है। यदि इसे सच्ची नीयत और जागरूकता के साथ बिताया जाए, तो यह न केवल व्यक्ति के चरित्र का निर्माण करता है, बल्कि एक शांतिपूर्ण और न्यायपूर्ण समाज की नींव भी रखता है।

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