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कचरे से कंचन तक! सुपौल की महिलाओं ने प्लास्टिक से बदल दी गांवों की तस्वीर

बिहार के सुपौल जिले में प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन इकाइयों का संचालन जीविका दीदियां कर रही हैं। इस पहल से महिलाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार मिला है, प्लास्टिक कचरे का वैज्ञानिक निपटान हो रहा है और ग्रामीण स्वच्छता को भी बढ़ावा मिला है।

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Supaul: बिहार के सुपौल जिले में प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन (पीडब्ल्यूएमयू) ग्रामीण स्वच्छता और महिला सशक्तिकरण का सफल मॉडल बनकर उभरा है। स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी जीविका दीदियां प्लास्टिक कचरे के संग्रहण और प्रसंस्करण का काम संभाल रही हैं। इस पहल से महिलाओं को स्थानीय स्तर पर स्थायी रोजगार मिला है और वे हर महीने हजारों रुपये की आमदनी भी कर रही हैं।

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प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन से महिलाओं को कैसे मिला रोजगार?

ग्रामीण विकास विभाग के तहत स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) और लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान के अंतर्गत पंचायत स्तर पर अपशिष्ट प्रबंधन इकाई (डब्ल्यूपीयू) और ब्लॉक स्तर पर प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन इकाई (पीडब्ल्यूएमयू) स्थापित की गई हैं।

सुपौल जिले के बसंतपुर, छातापुर, किशनपुर, पिपरा और सुपौल सदर प्रखंड में इन इकाइयों का संचालन जीविका दीदियों के हाथों किया जा रहा है। यहां घरों से निकलने वाले प्लास्टिक कचरे का संग्रहण, छंटाई, पृथक्करण, डस्ट रिमूविंग, श्रेडिंग और बेलिंग का कार्य प्रशिक्षित महिलाएं कर रही हैं।

सुपौल मॉडल से क्या बदलाव आया?

विभागीय अधिकारियों के अनुसार, जिले में अब तक दो दर्जन से अधिक महिलाओं को पंचायत और ब्लॉक स्तर पर स्थायी रोजगार मिला है। आंकड़ों के अनुसार, जीविका दीदियों ने अब तक 56,135 किलोग्राम प्लास्टिक कचरे का प्रसंस्करण किया है और इससे 2,10,622 रुपये का शुद्ध लाभ अर्जित किया है।

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सुपौल में इन इकाइयों को मजबूत बनाने के लिए करीब 80 लाख रुपये की लागत से अत्याधुनिक डस्ट रिमूवर, श्रेडिंग और बेलिंग मशीनें लगाई गई हैं। प्रत्येक पीडब्ल्यूएमयू पर मशीनों की स्थापना में लगभग 16 लाख रुपये खर्च किए गए हैं। इन मशीनों की मदद से प्लास्टिक की सफाई, कटाई और बंडल तैयार कर उसे विभिन्न उद्योगों को भेजा जाता है।

पर्यावरण संरक्षण और उद्यमिता को कैसे मिल रहा बढ़ावा?

ग्रामीण विकास विभाग के अनुसार, प्लास्टिक कचरे के वैज्ञानिक प्रसंस्करण से भूमि और जल स्रोतों को प्रदूषण से बचाने में मदद मिली है। इसके साथ ही महिला सशक्तिकरण, स्थानीय उद्यमिता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिल रही है। विभाग निजी एजेंसियों को भी इस योजना से जोड़ रहा है, ताकि प्लास्टिक अपशिष्ट के बेहतर उपयोग के साथ रोजगार के नए अवसर पैदा किए जा सकें।

मंत्री ने क्या कहा?

ग्रामीण विकास विभाग तथा सूचना एवं जनसंपर्क मंत्री श्रवण कुमार ने कहा कि लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान और प्लास्टिक कचरा प्रबंधन इकाइयों के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं और जीविका दीदियों को आजीविका के नए साधन मिले हैं। उन्होंने कहा कि इस पहल से महिलाओं का आर्थिक सशक्तिकरण होने के साथ गांवों में स्वच्छता भी बढ़ी है। सरकार ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार और उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए लगातार आर्थिक सहायता और ऋण उपलब्ध करा रही है।

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