रांची: झारखंड की माटी से एक बार फिर जल, जंगल, जमीन और संस्कृति के वास्तविक संरक्षकों की पहचान को लेकर निर्णायक आवाज बुलंद हुई है। लोक सेवा समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं झारखंड अलग राज्य आंदोलनकारी सह समाजसेवी मोहम्मद नौशाद ने देश के प्रधानमंत्री, राज्यपाल, झारखंड के मुख्यमंत्री तथा केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री को एक विस्तृत व भावुक ज्ञापन भेजा है। ज्ञापन में स्पष्ट चेतावनी दी गई है कि यदि आदिवासी और मूलवासी समाज की विशिष्ट सांस्कृतिक, भाषाई और धार्मिक पहचान को संवैधानिक मान्यता नहीं मिली, तो आने वाली पीढ़ियां अपनी जड़ों से पूरी तरह कट जाएंगी।
आदिवासी धरती के प्रथम वंशज और प्रकृति के स्वाभाविक संरक्षक
मोहम्मद नौशाद ने पत्र में रेखांकित किया कि आदिवासी इस धरती के प्रथम वंशज और प्रकृति के स्वाभाविक संरक्षक हैं। विज्ञान और मानव सभ्यता का इतिहास प्रमाणित करता है कि जब से इस धरा पर जीवन का प्रादुर्भाव हुआ, तब से आदिवासी समुदाय प्रकृति के साहचर्य में जीवन व्यतीत करता आ रहा है। मूलवासी भी सदियों से इसी माटी में उनके सुख-दुख के सहयात्री रहे हैं। आदिवासी परंपरा किसी मूर्ति पूजा या कृत्रिम कर्मकांड की मोहताज नहीं है; उनका धर्म ही साक्षात प्रकृति है। जाहेर थान, सरना स्थल, साल और पीपल के वृक्ष, सदानीरा नदियां, पर्वतमालाएं और सूर्यदेव यही उनके आराध्य हैं। प्रकृति पूजक होने के कारण ही वे कभी किसी स्थापित धार्मिक सांचे में खुद को नहीं ढाल सके, जिसका परिणाम यह हुआ कि आजादी के दशकों बाद भी जनगणना प्रपत्र में उन्हें उनका स्वतंत्र ‘धर्म कोड’ नहीं मिल सका।
सांस्कृतिक क्षरण और पहचान के संकट पर गहरी चिंता
ज्ञापन में पिछले दो-तीन सौ वर्षों से चल रहे सांस्कृतिक क्षरण और पहचान के संकट पर गहरी चिंता व्यक्त की गई है। नौशाद ने कहा कि एक सोची-समझी प्रक्रिया के तहत संथाली, हो, मुंडारी, कुड़ुख, खड़िया, नागपुरी और कुरमाली जैसी समृद्ध प्राचीन भाषाओं को विद्यालयों और शैक्षणिक पाठ्यक्रमों से बाहर धकेला गया। सरहुल, करम, जतरा और सोहराय जैसे प्रकृति उत्सवों की जगह बाहरी रीति-रिवाजों को बढ़ावा देकर इस धरती की मौलिक विरासत को कुंद करने का प्रयास हुआ। सबसे गंभीर संकट जनगणना के दौरान सामने आता है, जहां जागरूकता के अभाव और सरकारी लाभ के नाम पर आदिवासियों को पारंपरिक पहचान से अलग मुख्यधारा के धर्मों के कॉलम में दर्ज कर दिया जाता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि किसी संपर्क प्रभाव के चलते पूरे समाज पर कोई दूसरा धार्मिक लेबल लगाना न्यायसंगत नहीं है।
इस भाषाई और सामाजिक विसंगति का सीधा असर आदिवासियों के अस्तित्व और अधिकारों पर पड़ रहा है। जब कागजों पर आदिवासियों की वास्तविक जनसांख्यिकी घटती है, तो इसका सीधा असर उनके बजटीय आवंटन, भाषाई संरक्षण और कल्याणकारी योजनाओं पर पड़ता है। छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT), संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम (SPT) और पेसा (PESA) कानून जैसे सुरक्षा कवच कमजोर पड़ते हैं, जिससे जंगलों और जमीनों के कॉरपोरेट या अवैध दोहन का रास्ता सुगम हो जाता है।
इस व्यवस्थागत अनदेखी को खत्म करने के लिए लोक सेवा समिति ने शासन और प्रशासन के समक्ष चार ठोस मांगें रखी हैं:
जनगणना में अलग आदिवासी/सरना धर्म कोड: आगामी राष्ट्रीय जनगणना में आदिवासियों को किसी अन्य धार्मिक कॉलम में बांधने के बजाय उनके लिए अलग ‘आदिवासी धर्म कोड’ दर्ज किया जाए। झारखंड विधानसभा द्वारा पारित प्रस्ताव को केंद्र सरकार शीघ्रता से कानूनी रूप दे।
प्राथमिक शिक्षा में मातृभाषा की अनिवार्यता: झारखंड के सभी प्राथमिक विद्यालयों में संथाली, हो, मुंडारी, कुड़ुख, कुरमाली, नागपुरी और पंचपरगनिया जैसी स्थानीय भाषाओं में बुनियादी पढ़ाई को अनिवार्य किया जाए, ताकि बालमन अपनी मातृभाषा और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा रहे।
संवैधानिक सुरक्षा कानूनों का कड़ाई से अनुपालन: संविधान की 5वीं अनुसूची, CNT/SPT एक्ट और पेसा कानून को अक्षरशः जमीन पर लागू किया जाए तथा आदिवासी-मूलवासी के जल, जंगल और जमीन की खुली लूट पर पूर्ण विराम लगे।
मौलिक पहचान का सम्मान: आदिवासी को आदिवासी और मूलवासी को मूलवासी की मौलिक पहचान के साथ ही जीने दिया जाए। किसी भी सरकारी लाभ या दबाव की आड़ में उनकी ऐतिहासिक व प्राकृतिक अस्मिता को विलोपित न किया जाए।
ज्ञापन के अंत में मोहम्मद नौशाद ने मार्मिक सवाल उठाते हुए कहा कि झारखंड राज्य के गठन को 26 वर्ष समाप्त होने को है, यदि माटी के बेटों को अब भी अपनी भाषा, जमीन और अस्तित्व के लिए गुहार लगानी पड़े, तो यह नीति-नियंताओं के लिए आत्ममंथन का विषय है। अब समय आ गया है कि व्यवस्था अपनी पुरानी सोच बदले और इस ऐतिहासिक अन्याय का स्थायी समाधान निकाले।





