Ranchi: कभी झारखंड के औद्योगिक शहरों की सड़कों, नालों के किनारे और खाली मैदानों में बिना किसी देखभाल के बेतहाशा उगने वाला ‘आइपोमिया कोर्निया’ का पौधा अब धीरे-धीरे गायब होने लगा है। स्थानीय भाषा में जिसे बेहया, बेशर्म, अमरी या थेथर के नाम से जाना जाता है, वह पौधा कभी पर्यावरण सुरक्षा के लिए एक प्राकृतिक वरदान माना जाता था। करीब 7 साल पहले तक यह पौधा आम झाड़ियों की तरह जगह-जगह दिखाई देता था, लेकिन आज यह लुप्त होने की कगार पर पहुँच गया है। यह स्थिति तब बनी है जब इस पौधे की सबसे बड़ी खासियत ही यह थी कि इसे बिना किसी देखभाल या सिंचाई के भी कहीं भी पनपाया जा सकता था।
वैज्ञानिकों और वनस्पति विज्ञान के जानकारों के अनुसार, आइपोमिया कोर्निया को कॉनोवोल्वुलेशिया (Convolvulaceae) फैमिली का एक ‘आक्रामक’ यानी इनवेसिव प्लांट माना जाता है। हालांकि, इस साधारण से दिखने वाले पौधे की सबसे बड़ी वैज्ञानिक खूबी यह है कि यह औद्योगिक अपशिष्टों (इंडस्ट्रियल वेस्ट) से निकलने वाले खतरनाक और जहरीले धातुओं के अवशेषों को सोख लेता है। यदि किसी औद्योगिक इकाई का डंपिंग यार्ड है, तो वहां आइपोमिया कोर्निया को उगाने मात्र से वहां की मिट्टी को जहरीले तत्वों से बंजर होने से बचाया जा सकता है।
यह पौधा औद्योगिक अवशेषों में मिलने वाली कैडमियम, कॉपर, क्रोमियम, निकल, लेड और जिंक जैसी घातक और जहरीली धातुओं के अंशों को मिट्टी और पानी से खींचकर अपनी जड़ों, तनों और पत्तियों में जमा कर लेता है। इस प्रक्रिया को वैज्ञानिक भाषा में फाइटोरेमेडिएशन कहते हैं, जो इकोसिस्टम को बचाने के लिए सबसे किफायती, सुरक्षित और इको-फ्रेंडली प्राकृतिक तकनीक मानी जाती है। यूजीसी प्रमाणित जर्नल ऑफ इमर्जिंग टेक्नोलॉजीज एंड इनोवेटिव रिसर्च में प्रकाशित एक शोध रिपोर्ट में भी इस पौधे की प्रदूषण सोखने की अद्भुत क्षमता की पुष्टि की गई है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि इस पौधे में भारी धातुओं के प्रदूषण को सोखने की क्षमता के अलावा कई औषधीय गुण भी छिपे हैं। प्राचीन और स्थानीय इलाज में इस पौधे की जड़ों और तनों से निकलने वाले दूध (सफेद द्रव) का इस्तेमाल त्वचा संबंधी रोगों के उपचार में किया जाता रहा है। इतना ही नहीं, यह सफेद दूध सफेद दाग (ल्यूकोडर्मा) जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज में भी काफी असरदार माना जाता रहा है।
हालांकि, इस पौधे की यही खासियत इसके लुप्त होने की सबसे बड़ी वजह भी बन गई है। हवा, पानी और मिट्टी से भारी धातुओं के जहरीले अवशेषों को सोखने के कारण यह पौधा खुद बेहद विषैला हो जाता है। जब यह जहरीले अवशेष इसके तनों और पत्तियों में जमा हो जाते हैं, तो अगर कोई जानवर इसे भूलवश खा ले, तो उसके स्वास्थ्य पर बहुत ही बुरा असर पड़ता है।
इसके अलावा, ग्रामीण और स्थानीय लोग अक्सर इसके सूखे तनों और लकड़ियों का इस्तेमाल खाना बनाने के लिए जलावन के रूप में करते रहे हैं। चूंकि पौधे के अंदर खतरनाक केमिकल और जहरीली धातुएं जमा होती हैं, इसलिए इसे जलाने पर निकलने वाला धुआं इंसानों के लिए अत्यंत घातक साबित होता है। शोध बताते हैं कि इस पौधे के धुएं के संपर्क में लगातार रहने से टीबी (तपेदिक) और सांस से जुड़ी गंभीर बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
जैसे-जैसे लोगों को यह बात समझ में आने लगी कि आइपोमिया को जलाने से हवा जहरीली हो रही है और बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है, उन्होंने खुद ही इस पौधे से दूरी बनाना शुरू कर दिया। कई जगहों पर इसे उखाड़कर नष्ट कर दिया गया, ताकि न तो मवेशी इसे खा सकें और न ही कोई इसे जलावन के रूप में इस्तेमाल करे। लोग इसे एक विषैली झाड़ी मानकर दूर होते गए और यही वजह बनी कि धीरे-धीरे यह पौधा प्राकृतिक रूप से लुप्त होने लगा।
वनस्पति विज्ञान और पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि आइपोमिया कोर्निया के गायब होने से औद्योगीकरण से प्रभावित इलाकों की मिट्टी और जलस्रोतों पर प्रदूषण का असर और अधिक गहरा सकता है। जहां एक तरफ यह पौधा हवा और मिट्टी की प्राकृतिक सफाई कर रहा था, वहीं दूसरी तरफ इसकी अनदेखी और इसके जहरीले असर के डर से इसे पूरी तरह नष्ट किया जा रहा है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि इस पौधे को रिहायशी इलाकों और मवेशियों की पहुँच से दूर केवल औद्योगिक डंपिंग साइट्स पर नियंत्रित तरीके से उगाया जाना चाहिए, ताकि यह पर्यावरण को साफ रखने का अपना काम बिना किसी नुकसान के कर सके।



