रांची: भगवान बिरसा जैविक उद्यान (बिरसा मुंडा चिड़ियाघर) इन दिनों एक अजीबोगरीब और गंभीर प्रशासनिक संकट से जूझ रहा है। चिड़ियाघर के सबसे बड़े आकर्षण शेर, बाघ और तेंदुए आजकल अपने दैनिक भोजन यानी मांस के लिए तरस रहे हैं। स्थिति इतनी विकट हो गई है कि मांस की नियमित आपूर्ति पूरी तरह ठप पड़ गई है, जिससे इन खूंखार वन्यजीवों के स्वास्थ्य पर खतरा मंडराने लगा है।

टेंडर प्रक्रिया में फंसा पेंच

इस संकट की मुख्य वजह चिड़ियाघर प्रशासन की टेंडर प्रक्रिया है। वर्ष 2026-27 के लिए मांस आपूर्ति हेतु जारी किए गए टेंडर को लगातार दूसरी बार रद्द करना पड़ा है। नियम के अनुसार, प्रतिदिन लगभग 118.75 किलो बिना हड्डी वाला और 30 किलो हड्डी सहित मांस की जरूरत होती है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इस बार केवल दो ही आवेदकों ने रुचि दिखाई। पर्याप्त प्रतिस्पर्धा न होने के कारण नियमों का हवाला देते हुए प्रशासन ने टेंडर रद्द कर दिया, लेकिन इसका खामियाजा बेजुबान जानवरों को भुगतना पड़ रहा है।

विवादों में पुराना सप्लायर और ‘आजादबस्ती कांड’

मामला तब और पेचीदा हो गया जब पुराने सप्लायर खालिद रजा का नाम सामने आया। पिछले साल भी टेंडर रद्द होने पर उन्हीं को जिम्मेदारी दी गई थी। लेकिन वर्तमान में खालिद रजा ‘आजादबस्ती प्रतिबंधित मांस कांड’ में आरोपी है और फरार चल रहा है। ऐसे में पुराने सप्लायर से काम लेना नामुमकिन है और नया सप्लायर मिल नहीं रहा है।

जानवरों के स्वास्थ्य पर विशेषज्ञों की चिंता

चिड़ियाघर प्रबंधन का कहना है कि वे पारदर्शिता के लिए टेंडर रद्द कर रहे हैं, लेकिन वन्यजीव विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि शेरों और बाघों जैसे जानवरों के भोजन में देरी या कटौती उनके व्यवहार को हिंसक बना सकती है और उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) को कम कर सकती है। अब सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन नियमों की आड़ में इन बेजुबानों की जान जोखिम में डाल रहा है? फिलहाल, चिड़ियाघर के पिंजरों में सन्नाटा और भूख की सुगबुगाहट है, और समाधान की फाइलें दफ्तरों में धूल फांक रही हैं।

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