रांची : झारखंड में मंगलवार को करम पर्व पारंपरिक उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। यह पर्व प्रकृति, खेती और सामाजिक एकता से जुड़ा हुआ है। आदिवासी समाज में करम पर्व का विशेष महत्व है। इस दिन करम वृक्ष की डाल की पूजा कर अच्छी फसल, परिवार की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना की जाती है।
करम पर्व के मौके पर गांवों में मांदर की थाप सुनाई देती है। लोग पारंपरिक गीत गाते हैं और करम नृत्य करते हैं। बहनें अपने भाइयों की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए पूजा करती हैं।
सात तरह के बीज बोने की परंपरा
करम पर्व की तैयारी कई दिन पहले शुरू हो जाती है। पूजा के लिए नदी से रेत लाकर उसमें जौ, मक्का, गेहूं, चावल, चना, कुल्थी और मसूर जैसे सात तरह के बीज बोए जाते हैं। इनसे निकले अंकुरों को ‘जावा’ कहा जाता है। इसे नई जिंदगी और अच्छी फसल का प्रतीक माना जाता है।
पूजा के दौरान करम वृक्ष की तीन शाखाओं को घर के आंगन या गांव के अखाड़े में स्थापित किया जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों में पूजा की विधि और मान्यताओं में कुछ अंतर भी देखने को मिलता है।
करम-धरम की लोककथा
करम पर्व से जुड़ी करम और धरम दो भाइयों की लोककथा भी प्रचलित है। लोककथा के अनुसार करम वृक्ष का अपमान होने के बाद परिवार पर परेशानियां आने लगीं। बाद में करम देवता की पूजा और क्षमा मांगने के बाद परिवार में सुख-समृद्धि लौट आई। इसी मान्यता के कारण करम की डाल को पवित्र मानकर उसकी पूजा की जाती है।
प्रकृति संरक्षण का संदेश
करम पर्व केवल धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह प्रकृति और पर्यावरण के प्रति सम्मान का संदेश भी देता है। इसमें पेड़-पौधों, जंगल और खेती को जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। यह पर्व भाई-बहन के रिश्ते, दोस्ती, सामाजिक एकता और आपसी सहयोग को भी मजबूत करता है।
पूजा के बाद करम गीत और नृत्य के जरिए लोग अपनी लोक परंपराओं और संस्कृति को अगली पीढ़ी तक पहुंचाते हैं। यही वजह है कि करम पर्व झारखंड की लोक संस्कृति में आज भी खास स्थान रखता है।




