Ranchi: राज्य में अल्पसंख्यक समुदायों मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, पारसी और जैन के संवैधानिक एवं कानूनी अधिकारों की रक्षा, उनके सामाजिक-आर्थिक उत्थान और कल्याणकारी योजनाओं की निगरानी के लिए गठित झारखंड राज्य अल्पसंख्यक आयोग अपने मूल कर्तव्यों से ही भटकता नजर आ रहा है। अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति, अल्पसंख्यक एवं पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग द्वारा जारी अधिसूचना संख्या अल्प०आ०ग०-021/17-2019 के अनुसार, 8 सितंबर 2023 को आयोग का पुनर्गठन किया गया था। झारखंड राज्य अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम, 2001 की धारा 4(2) और धारा 5 के प्रावधानों के तहत अध्यक्ष हिदायतुल्लाह खान, उपाध्यक्ष शमशेर आलम व ज्योति सिंह मथारू तथा 8 अन्य सदस्यों (मोस्लेउद्दीन तौसिफ, सुशील मरांडी, वारिश कुरैशी, सफ्फार अंसारी, बरकत अली, इकरारूल हसन, सबिता टुडू एवं सोगरा बीवी) को तीन वर्षों के कार्यकाल के लिए नियुक्त किया गया था।
यह तीन साल की अवधि 8 सितंबर 2026 को समाप्त हो चुकी है। लेकिन बड़े ही अफ़सोस और चिंता की बात यह है कि इस पूरे कार्यकाल के समाप्त हो जाने के बावजूद आयोग के निवर्तमान पदधारकों ने राज्य सरकार को अपना अनिवार्य ‘वार्षिक प्रतिवेदन’ (Annual Report) न तो प्रकाशित कराकर सौंपा और न ही इसे मीडिया व जनता के समक्ष सार्वजनिक किया जबकि इससे पूर्व डॉ शाहिद अख्तर के कार्यकाल में यह नियमित रूप से प्रकाशित होता रहा है। संवैधानिक और प्रशासनिक मूल्यों की यह अनदेखी न केवल आयोग के निवर्तमान पदधारियों की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करती है, बल्कि भविष्य में आने वाले नए पदधारकों के लिए एक अत्यंत ही निराशाजनक और गैर-जिम्मेदाराना मिसाल पेश करती है।वार्षिक प्रतिवेदन सिर्फ एक कागज नहीं, अल्पसंख्यकों का अधिकार पत्र
किसी भी राज्य के अल्पसंख्यक आयोग के लिए उसका वार्षिक प्रतिवेदन केवल एक औपचारिक या प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं होती, बल्कि यह राज्य के लाखों अल्पसंख्यकों के हक और अधिकारों का लेखा-जोखा होता है। एक आदर्श और पारदर्शी वार्षिक प्रतिवेदन में राज्य के अल्पसंख्यक समुदायों की वास्तविक स्थिति, उनकी समस्याओं और उनके समाधान का पूरा ब्यौरा दर्ज होता है।
नियमों और परंपराओं के अनुसार, इस रिपोर्ट में निम्नलिखित 8 मुख्य अध्यायों का होना अनिवार्य माना जाता है:
- प्रस्तावना और संरचना: आयोग के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सदस्यों का विवरण, आयोग के वैधानिक अधिकार, नीतियां तथा वार्षिक उपलब्धियों का अध्यक्षीय संदेश।
- जनसांख्यिकीय व सामाजिक-आर्थिक स्थिति: राज्य में अल्पसंख्यक समुदायों की आबादी, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और जीवन-स्तर के मुख्य संकेतकों का वैज्ञानिक आंकलन।
- शिकायतें और सुनवाई (Grievances & Redressal): साल भर में धार्मिक, शैक्षणिक, सामाजिक या प्रशासनिक उत्पीड़न से जुड़ी प्राप्त शिकायतें, उन पर की गई सुनवाई, दिए गए आदेश तथा आयोग द्वारा स्वतः संज्ञान (Suo Moto) में लिए गए मामलों का ब्यौरा।
- सरकारी योजनाओं की समीक्षा: केंद्र व राज्य सरकार की कल्याणकारी योजनाओं (जैसे छात्रवृत्ति, हुनर हाट, सीखो और कमाओ) के क्रियान्वयन की स्थिति, आवंटित बजट का वास्तविक खर्च तथा स्वरोजगार हेतु दिए गए ऋण की रिपोर्ट।
- शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक संरक्षण: मदरसा बोर्ड, मिशनरी स्कूलों, अल्पसंख्यक दर्जा प्राप्त शिक्षण संस्थानों की स्थिति, विभिन्न छात्रवृत्तियों के लाभार्थियों का आंकड़ा तथा अल्पसंख्यक भाषाओं, कला और धार्मिक स्थलों के संरक्षण के प्रयास।
- स्थल निरीक्षण और दौरा रिपोर्ट: आयोग के सदस्यों द्वारा विभिन्न जिलों का दौरा, सांप्रदायिक तनाव या विवादों के दौरान आयोग के सीधे हस्तक्षेप और राहत कार्यों की निष्पक्ष रिपोर्ट।
- सरकार को दी गई सिफारिशें: राज्य में अल्पसंख्यकों के उत्थान, मानवाधिकार उल्लंघनों को रोकने और भेदभाव मिटाने के लिए सरकार को दिए गए नीतिगत और कानूनी सुझाव।
- प्रशासनिक व वित्तीय लेखा-जोखा: आयोग का वार्षिक बजट, ऑडिट रिपोर्ट तथा मानव संसाधन की स्थिति।
जब यह रिपोर्ट तैयार की जाती है, तो इसे राज्य सरकार के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है और सरकार इसे विधानमंडल (Assembly) के पटल पर रखती है, ताकि जनप्रतिनिधि इस पर चर्चा कर सकें और नीतियां बना सकें।
जवाबदेही का अभाव: क्या छिपाना चाहते थे पदधारक?
आयोग के निवर्तमान पदधारकों द्वारा इस महत्वपूर्ण प्रतिवेदन को दबाया जाना यह दर्शाता है कि संस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही नाम की कोई चीज़ नहीं बची थी। सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या आयोग के पास सालभर की अपनी उपलब्धियों को दिखाने के लिए कुछ था ही नहीं? या फिर अल्पसंख्यक कल्याण निधि और योजनाओं के क्रियान्वयन में हुई विफलताओं को छिपाने के लिए इस रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया गया?
जब आयोग की पूरी टीम 8 सितंबर 2026 तक अपने पदों पर आसीन रही, सरकारी सुविधाएं और भत्ते लेती रही, तब उन्होंने अल्पसंख्यकों के अधिकारों से जुड़े इस महत्वपूर्ण दस्तावेज को तैयार करने में इतनी उदासीनता क्यों दिखाई? मीडिया के सामने रिपोर्ट पेश न करना यह सिद्ध करता है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में ‘जनता के जवाबदेही के अधिकार’ को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया गया।
नए पदधारकों के लिए चेतावनी और अनुकरणीय सबक
झारखंड राज्य अल्पसंख्यक आयोग की यह विफलता भविष्य में पदभार ग्रहण करने वाले नए पदाधिकारियों के लिए एक बड़ा सबक है। किसी भी सार्वजनिक पद पर बैठना केवल अधिकार और सम्मान का विषय नहीं होता, बल्कि उसके साथ अपार जन-उत्तरदायित्व भी जुड़ा होता है।
नए आने वाले पदाधिकारियों को इस नकारात्मक नजीर से सीख लेते हुए आयोग की साख को पुनः बहाल करना होगा। उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि:
- कार्यकाल के प्रत्येक वर्ष की प्रगति रिपोर्ट और वार्षिक प्रतिवेदन समय पर तैयार कर सरकार और विधानमंडल को सौंपा जाए।
- आयोग के कार्यों और निर्णयों में पूरी पारदर्शिता रखी जाए और नियमित रूप से प्रेस कॉन्फ्रेंस कर जनता को आयोग की गतिविधियों की जानकारी दी जाए।
- अल्पसंख्यक समुदाय के अंतिम व्यक्ति तक योजनाओं का लाभ पहुंचे और उनकी शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई हो।
यदि भावी पदधारक भी इसी तरह की लापरवाही दोहराते हैं, तो अल्पसंख्यक आयोग जैसी पवित्र और

महत्वपूर्ण संस्थाएं केवल कागजी औपचारिकता और सफेद हाथी बनकर रह जाएंगी, जिससे राज्य के अल्पसंख्यक समुदायों का विश्वास पूरी तरह से उठ जाएगा।
“हां, अल्पसंख्यक आयोग की ओर से कोई वार्षिक प्रतिवेदन पिछले तीन वर्षों में नहीं बन पाया है और ना ही सरकार को जमा किया जा सका है। इसका अफसोस मुझे भी है। यदि वार्षिक प्रतिवेदन बन जाता ताे बेहतर होता।”–हिदायतुल्ला खान, निवर्तमान अध्यक्ष, झारखंड राज्य अल्पसंख्यक आयोग

जवाबदेही का अभाव: क्या छिपाना चाहते थे पदधारक?


