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World News: पश्चिम एशिया में हालात तेजी से बिगड़ते जा रहे हैं। इजराइल और ईरान (Israel-Iran War) के बीच जारी संघर्ष अब एक खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। रविवार को इजराइल के लगभग 20 फाइटर जेट्स ने ईरान के केरमंशाह, हमीदान और तेहरान जैसे प्रमुख शहरों में बमबारी की। इजराइली डिफेंस फोर्स (IDF) ने इस कार्रवाई की पुष्टि करते हुए कहा कि हमले पूरी तरह खुफिया सूचनाओं पर आधारित थे।
IDF के मुताबिक, टारगेट किए गए स्थानों में मिसाइल स्टोरेज, रडार सिस्टम, सैटेलाइट कम्युनिकेशन उपकरण और सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल लॉन्च साइट शामिल थीं। इजराइल ने इन हमलों को अपनी हवाई श्रेष्ठता कायम रखने और नागरिकों की रक्षा के लिए जरूरी बताया।
इस बीच, संघर्ष में अमेरिका की सक्रिय भागीदारी ने पूरे घटनाक्रम को और गंभीर बना दिया है। अमेरिका ने ईरान की तीन प्रमुख न्यूक्लियर साइट्स – फोर्डो, नतांज और एस्फाहान पर अचानक हमला कर दिया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यह भी कहा कि ईरान को अब युद्ध समाप्त करने के लिए सहमत होना चाहिए।
इधर, संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने विशेष सत्र बुलाकर शांति की अपील की है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि कूटनीतिक प्रयासों को प्राथमिकता नहीं दी गई, तो हालात और बिगड़ सकते हैं।
एयर ट्रैफिक और एविएशन इंडस्ट्री पर असर
ईरान-इजराइल संघर्ष का असर अब वैश्विक उड़ानों और एविएशन इंडस्ट्री पर भी साफ दिखाई दे रहा है। अमेरिका द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के बाद मध्य पूर्व के हवाई मार्ग को लेकर सुरक्षा चिंताएं बढ़ गई हैं। कई प्रमुख एयरलाइनों ने ईरान, इराक, सीरिया और इजराइल के ऊपर से उड़ान भरने से बचना शुरू कर दिया है, जिससे उड़ानों का मार्ग लंबा हो गया है। इसके कारण ईंधन की खपत और उड़ान लागत में इजाफा हो रहा है।
एविएशन ट्रैकिंग सर्विस ने बताया कि अब विमान कैस्पियन सागर, मिस्र और सऊदी अरब जैसे वैकल्पिक सुरक्षित मार्गों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे न केवल यात्रा समय बढ़ा है, बल्कि यात्रियों को अधिक भुगतान भी करना पड़ रहा है।
सेफ एयरस्पेस जैसे एविएशन रिस्क मॉनिटरिंग ग्रुप्स ने चेतावनी दी है कि अमेरिकी एयरलाइनों के लिए खतरा बढ़ सकता है, खासकर यदि ईरान जवाबी कार्रवाई करता है या हिजबुल्लाह जैसे सहयोगियों को सक्रिय करता है। इससे बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब और UAE जैसे खाड़ी देशों में भी संकट गहरा सकता है।
इजराइल की प्रमुख एयरलाइनों ने अपने नागरिकों को वापस लाने के लिए रेस्क्यू फ्लाइट्स स्थगित कर दी हैं और 27 जून तक सभी नियमित उड़ानों को रद्द कर दिया है।
भारत की भूमिका और रुख
भारत इन हालातों को लेकर चिंतित है। एक भारतीय डिफेंस एक्सपर्ट ने कहा कि भारत की दोनों ही देशों से मजबूत राजनयिक और व्यापारिक रिश्ते हैं। ऐसे में भारत किसी एक पक्ष के साथ खड़ा नहीं हो सकता, बल्कि शांति और स्थिरता का पक्षधर है।
उन्होंने कहा, “भारत चाहेगा कि यह युद्ध जल्द से जल्द समाप्त हो। क्योंकि यह न केवल पश्चिम एशिया की स्थिरता को प्रभावित कर रहा है, बल्कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा और कच्चे तेल की आपूर्ति पर भी असर डाल सकता है।”
यदि इस संघर्ष के चलते तेल आपूर्ति में बाधा आती है, या परिवहन मार्ग लंबा होता है, तो भारत में पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में वृद्धि हो सकती है। यही कारण है कि भारत की सरकार और विदेश मंत्रालय लगातार कूटनीतिक चैनलों के जरिए इस संघर्ष को रोकने की अपील कर रहे हैं।
एक अन्य डिफेंस विश्लेषक ने बताया कि अमेरिका ने बी-52 बॉम्बर्स और सबमरीन-लॉन्च मिसाइल्स के जरिए ईरान के न्यूक्लियर ठिकानों को तबाह कर दिया है, जिसका उद्देश्य ईरान को परमाणु हथियार निर्माण से रोकना था। उनका मानना है कि अमेरिका का अगला कदम सत्ता परिवर्तन की ओर हो सकता है, लेकिन इसके लिए ईरानी जनता का समर्थन आवश्यक होगा।
क्या हो सकता है आगे?
इजराइल, ईरान और अमेरिका के बीच यह त्रिकोणीय संघर्ष पूरे मध्य पूर्व क्षेत्र को अस्थिर कर सकता है। लगातार हो रहे मिसाइल और ड्रोन हमले क्षेत्रीय शांति को खतरे में डाल रहे हैं। हालांकि फिलहाल नागरिक विमानों को कोई सीधा खतरा नहीं बताया गया है, लेकिन सुरक्षा एजेंसियां सतर्क हैं।
संयुक्त राष्ट्र, भारत और अन्य वैश्विक शक्तियों की यही प्राथमिकता है कि जल्द से जल्द संघर्ष पर विराम लगे और बातचीत के जरिए समाधान निकले। लेकिन मौजूदा हालात यह संकेत देते हैं कि स्थिति अभी और बिगड़ सकती है।

