घाघरा (गुमला)। पांचवीं अनुसूची एवं पेसा अधिकार संरक्षण आंदोलन के तहत मंगलवार को घाघरा प्रखंड परिसर में एक दिवसीय धरना-प्रदर्शन का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में प्रखंड क्षेत्र के विभिन्न गांवों के पहान-पुजारों के नेतृत्व में बड़ी संख्या में ग्रामीण महिला-पुरुष शामिल हुए। धरना के माध्यम से पेसा कानून को उसकी मूल भावना के अनुरूप लागू करने और ग्राम सभाओं को उनके अधिकार प्रदान करने की मांग उठाई गई। धरना को संबोधित करते हुए पूर्व राज्यसभा सांसद समीर उरांव ने कहा कि आजादी के बाद आदिवासी समाज के अग्रणी नेता बाबा कार्तिक उरांव ने जिस पेसा व्यवस्था की परिकल्पना की थी, उसे झारखंड में सही स्वरूप में लागू नहीं किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि पांचवीं अनुसूची और पेसा अधिनियम के तहत ग्राम सभाओं तथा गांवों के पारंपरिक प्रमुखों को मिलने वाले अधिकार व्यवहारिक रूप से नहीं दिए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि ग्राम सभाओं को सशक्त बनाने के बजाय अधिकार प्रशासनिक व्यवस्था के अधीन कर दिए गए हैं, जो पेसा कानून की मूल भावना के विपरीत है। यदि समय रहते पांचवीं अनुसूची और पेसा कानून को पूरी मजबूती के साथ लागू नहीं किया गया तो आदिवासी समाज व्यापक जनआंदोलन के लिए बाध्य होगा। समीर उरांव ने कहा कि जल, जंगल और जमीन पर आदिवासी समाज का पारंपरिक अधिकार रहा है और भविष्य में भी यह अधिकार सुरक्षित रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि समाज अपने संवैधानिक और पारंपरिक अधिकारों की रक्षा के लिए लोकतांत्रिक तरीके से संघर्ष जारी रखेगा। धरना को संबोधित करते हुए पवन कुमार भगत ने कहा कि आदिवासी समाज शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी मांगों को सरकार तक पहुंचा रहा है। उन्होंने झारखंड सरकार से मांग की कि पेसा कानून को उसकी वास्तविक भावना के अनुरूप लागू किया जाए। ऐसा नहीं होने पर चरणबद्ध आंदोलन चलाया जाएगा। धरना-प्रदर्शन में सुनील उरांव, विष्णु उरांव, लोकनाथ पहान, संजय पहान, सुरेश उरांव, शोमी उरांव, जयप्रकाश भगत, जागे पहान और सोबरन उरांव सहित विभिन्न गांवों के पहान-पुजार तथा बड़ी संख्या में ग्रामीण महिला-पुरुष उपस्थित रहे।
पेसा अधिकारों की अनदेखी बर्दाश्त नहीं, सड़क से सदन तक होगा आंदोलन : समीर उरांव
पांचवीं अनुसूची एवं पेसा अधिकार संरक्षण आंदोलन के तहत आयोजित धरना में ग्राम सभा को सशक्त बनाने और पारंपरिक अधिकार बहाल करने की उठी मांग।




