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जाति जनगणना में कैसे दर्ज होगी आपकी जाति? सरकार के सामने दो बड़े विकल्प

New Delhi: देश में आगामी जनगणना के दूसरे चरण के साथ प्रस्तावित जाति जनगणना की तैयारियां तेज हो गई हैं। हालांकि प्रक्रिया शुरू होने से पहले सबसे बड़ा सवाल यह है कि लोगों की जाति का रिकॉर्ड किस तरीके से दर्ज किया जाएगा। सरकार का

New Delhi: देश में आगामी जनगणना के दूसरे चरण के साथ प्रस्तावित जाति जनगणना की तैयारियां तेज हो गई हैं। हालांकि प्रक्रिया शुरू होने से पहले सबसे बड़ा सवाल यह है कि लोगों की जाति का रिकॉर्ड किस तरीके से दर्ज किया जाएगा। सरकार का प्रयास है कि वर्ष 2011 की सामाजिक-आर्थिक एवं जाति जनगणना (SECC) के दौरान सामने आई तकनीकी और प्रशासनिक चुनौतियों से इस बार बचा जा सके। इसी उद्देश्य से डेटा संग्रह के विभिन्न मॉडलों पर विचार-विमर्श जारी है।

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इस बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने भी जातियों की पूर्वनिर्धारित सूची के इस्तेमाल को लेकर अपनी चिंता व्यक्त की है। संघ का कहना है कि यदि पहले से तैयार सूची का उपयोग किया जाता है, तो इससे ब्रिटिश शासनकाल में विकसित जातीय वर्गीकरण को और स्थायित्व मिल सकता है।

सरकार के सामने दो प्रमुख विकल्प

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया (RGI) के सामने फिलहाल दो प्रमुख विकल्पों पर विचार किया जा रहा है। पहला विकल्प यह है कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी जाति स्वयं बताए और जनगणना अधिकारी उसी विवरण को दर्ज करे। दूसरा विकल्प यह है कि जनगणना प्रपत्र या डिजिटल एप में पहले से तैयार जातियों की सूची उपलब्ध कराई जाए, जिसमें से संबंधित व्यक्ति अपनी जाति का चयन करे। बताया जा रहा है कि दोनों मॉडलों के अपने-अपने लाभ और चुनौतियां हैं। इसी कारण सरकार अंतिम निर्णय लेने से पहले सभी पहलुओं का परीक्षण कर रही है।

2011 के अनुभव से सबक

सरकार की सबसे बड़ी चिंता वर्ष 2011 की सामाजिक-आर्थिक एवं जाति जनगणना के अनुभव को लेकर है। उस समय लोगों को अपनी जाति स्वतंत्र रूप से दर्ज कराने की सुविधा दी गई थी, जिसके परिणामस्वरूप करीब 46.7 लाख अलग-अलग जातीय नाम दर्ज हुए। इनमें एक ही जाति के कई स्थानीय नाम, अलग-अलग वर्तनी और क्षेत्रीय पहचान शामिल थीं। इससे आंकड़ों का व्यवस्थित वर्गीकरण और विश्लेषण करना बेहद कठिन हो गया था। यही वजह रही कि उस डेटा का व्यापक स्तर पर उपयोग नहीं किया जा सका।

व्यापक डेटाबेस तैयार करने पर विचार

दूसरे विकल्प के तहत केंद्र और राज्यों द्वारा मान्यता प्राप्त जातियों की सूचियों को मिलाकर एक व्यापक डेटाबेस तैयार करने पर विचार किया जा रहा है। इस व्यवस्था में जनगणना अधिकारी उपलब्ध सूची के आधार पर संबंधित जाति का चयन करेंगे। माना जा रहा है कि इससे एक ही जाति के अलग-अलग नाम दर्ज होने जैसी समस्याओं में कमी आ सकती है। अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) की अधिसूचित सूचियां पहले से उपलब्ध हैं, जबकि अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) सहित अन्य वर्गों की जातियों को भी समेकित सूची में शामिल करने पर विचार किया जा रहा है। इसी मॉडल को लेकर RSS ने अपनी आपत्ति दर्ज कराई है।

भविष्य की नीतियों पर पड़ सकता है असर

केंद्र सरकार पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि आगामी जनगणना के दौरान ही जाति संबंधी जानकारी भी एकत्र की जाएगी। माना जा रहा है कि अगले वर्ष जनगणना के दूसरे चरण में यह प्रक्रिया शुरू हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि जाति जनगणना के आंकड़े भविष्य में आरक्षण, सामाजिक प्रतिनिधित्व और कल्याणकारी योजनाओं से जुड़ी नीतियों को प्रभावित कर सकते हैं। इसी कारण सरकार डेटा संग्रह की प्रक्रिया को पारदर्शी, विश्वसनीय और विवादों से यथासंभव मुक्त रखने पर जोर दे रही है।

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