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Home»Adda More..»होम्योपैथी में करियर का सुनहरा मौका, बिना साइड इफेक्ट इलाज की बढ़ी मांग
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होम्योपैथी में करियर का सुनहरा मौका, बिना साइड इफेक्ट इलाज की बढ़ी मांग

होम्योपैथिक दवाओं के कोई दुष्प्रभाव न होने के कारण दुनिया भर में डॉक्टरों की मांग तेजी से बढ़ रही है, जिससे इस क्षेत्र में छात्रों के लिए करियर के नए रास्ते खुले हैं।
By Samsul HaqueJune 18, 20264 Mins Read
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Ranchi: आजकल चिकित्सा के क्षेत्र में होम्योपैथी की ओर लोगों का रुझान बहुत तेजी से बढ़ा है। इन दवाओं के कोई दुष्प्रभाव (साइड इफेक्ट्स) नहीं होने के कारण दुनिया भर में होम्योपैथिक डॉक्टरों की मांग भी लगातार बढ़ती जा रही है। यही वजह है कि अब इस क्षेत्र में करियर बनाने के इच्छुक छात्र-छात्राओं की तादाद में भारी इजाफा हो रहा है। ऐसे में जो छात्र होम्योपैथिक डॉक्टर बनकर समाज की सेवा करना चाहते हैं, उनके लिए रोजगार के अवसर भी बढ़ते जा रहे हैं। इस प्रतिष्ठित क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए आपको निम्नलिखित योग्यताओं और प्रक्रियाओं को पूरा करना होगा:

Read more: BHMS डॉक्टर कैसे बनें? नीट से लेकर सैलरी और करियर तक की पूरी जानकारी यहां

क्या होनी चाहिए जरूरी योग्यता?

  • शैक्षणिक योग्यता: होम्योपैथी कोर्स में प्रवेश पाने की चाहत रखने वाले छात्रों का विज्ञान संकाय (पीसीबी – फिजिक्स, केमिस्ट्री, बायोलॉजी) के साथ 12वीं पास होना अनिवार्य है।

  • न्यूनतम अंक: 12वीं कक्षा में सामान्य वर्ग के छात्रों के कम से कम 50 फीसदी अंक होने चाहिए, जबकि आरक्षित श्रेणियों (जैसे ओबीसी, एससी, एसटी) के उम्मीदवारों के लिए 45 फीसदी अंक होना जरूरी है।

  • आयु सीमा: आवेदन के समय छात्र की कम से कम उम्र 17 साल होनी चाहिए।

  • नीट परीक्षा: देश के प्रमुख कॉलेजों में प्रवेश के लिए छात्र का नीट (NEET) क्वालिफाई होना जरूरी है।

आपको बता दें कि देश के विभिन्न होम्योपैथी पाठ्यक्रमों में एडमिशन के लिए तमाम बड़े संस्थान अपनी खुद की परीक्षाओं का भी आयोजन करते हैं, वहीं कई मुख्य संस्थान नीट के स्कोर के आधार पर ही सीधे प्रवेश देते हैं।

शॉर्ट टर्म सर्टिफिकेट और डिप्लोमा कोर्सेज

होम्योपैथिक पद्धतियों को समझने और इस क्षेत्र में बुनियादी जानकारी के लिए तमाम तरह के सर्टिफिकेट कोर्सेज भी करवाए जाते हैं। इन सर्टिफिकेट कोर्सेज की अवधि आमतौर पर 3 से 6 महीने की होती है।

इसके अलावा, होम्योपैथी में कई प्रकार के अंडर ग्रेजुएट (UG) और पोस्ट ग्रेजुएट (PG) डिप्लोमा कोर्सेज भी कराए जाते हैं। इन कोर्सेज में मुख्य रूप से ‘डिप्लोमा इन इलेक्ट्रो होम्योपैथी मेडिसिन’ और ‘डिप्लोमा इन होम्योपैथी एंड मेडिसिन’ आदि काफी लोकप्रिय हैं। इन डिप्लोमा पाठ्यक्रमों की अवधि 1 से 2 वर्ष के बीच होती है। वहीं स्नातक (ग्रेजुएशन) स्तर पर मुख्य कोर्स करने के लिए छात्र बीएचएमएस (BHMS) और बीईएमएस (BEMS) जैसे डिग्री पाठ्यक्रम चुन सकते हैं, जिनकी अवधि 3 से 5 साल की होती है।

क्या है बीएचएमएस (BHMS) कोर्स?

बीएचएमएस यानी ‘बैचलर ऑफ होम्योपैथिक मेडिसिन एंड सर्जरी’ एक पेशेवर डिग्री कोर्स है। इसमें छात्रों को बायोलॉजी, मानव शरीर विज्ञान (एनाटॉमी) और चिकित्सा की तमाम आधुनिक शाखाओं पर बुनियादी व उन्नत ज्ञान के साथ-साथ व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान करने वाले कई महत्वपूर्ण विषय पढ़ाए जाते हैं। इस कोर्स की डिग्री प्राप्त करने से पहले हर छात्र को अस्पताल में 1 साल की अनिवार्य इंटर्नशिप पूरी करनी होती है।

करियर और रोजगार की अपार संभावनाएं

होम्योपैथी के क्षेत्र में करियर की असीमित संभावनाएं मौजूद हैं। चूंकि होम्योपैथिक दवाइयों का शरीर पर कोई भी दुष्प्रभाव नहीं होता, इसलिए बहुत सारे लोग अब एलोपैथी को छोड़कर होम्योपैथिक इलाज में गहरा भरोसा जता रहे हैं। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक पर ये दवाएं समान रूप से और सुरक्षित असर करती हैं।

होम्योपैथिक दवाइयों का इस्तेमाल कई तरह की जटिल और पुरानी बीमारियों को जड़ से ठीक करने में किया जाता है, जिनमें मुख्य रूप से माइग्रेन, अवसाद (डिप्रेशन), क्रोनिक थकान सिंड्रोम, रूमेटोइड गठिया (गठिया बाय), विभिन्न प्रकार की एलर्जी, पुरानी खांसी और सर्दी, चिड़चिड़ा आंत्र सिंड्रोम (आईबीएस) और महिलाओं में होने वाला प्रीमेंस्ट्रुअल सिंड्रोम आदि का सफल इलाज शामिल है।

Read more: फिजियोथेरेपिस्ट अब नहीं लिख पाएंगे नाम के आगे ‘डॉ.’ – DGHS का बड़ा फैसला

छात्र इस कोर्स की डिग्री या डिप्लोमा प्राप्त करने के बाद केंद्र व राज्य सरकार के सरकारी अस्पतालों, आयुष केंद्रों और नामी प्राइवेट हॉस्पिटल्स में काम कर अपने शानदार करियर की शुरुआत कर सकते हैं। इसके अलावा वे खुद का क्लिनिक खोलकर एक स्वतंत्र होम्योपैथिक पेशेवर के तौर पर भी समाज में अपनी पहचान बना सकते हैं।

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