फॉण्ट कनवर्टर NEW

झारखंड भूमि सर्वे पर हाई कोर्ट सख्त: सचिव की जगह अवर सचिव ने क्यों दाखिल किया हलफनामा?

रांची: झारखंड में दशकों से कछुआ गति से चल रहे भूमि सर्वेक्षण (जमीन सर्वे) को लेकर झारखंड उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार और संबंधित विभाग के प्रति बेहद कड़ा रुख अख्तियार किया है। सोमवार को इस मामले से जुड़ी एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते

अपनी भाषा में पढ़ें

रांची: झारखंड में दशकों से कछुआ गति से चल रहे भूमि सर्वेक्षण (जमीन सर्वे) को लेकर झारखंड उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार और संबंधित विभाग के प्रति बेहद कड़ा रुख अख्तियार किया है। सोमवार को इस मामले से जुड़ी एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने राजस्व, निबंधन एवं भूमि सुधार विभाग की कार्यप्रणाली पर गहरी नाराजगी व्यक्त की। हाई कोर्ट ने अधिकारियों को आड़े हाथों लेते हुए पूछा कि जब पिछली सुनवाई में स्पष्ट रूप से विभाग के सचिव को व्यक्तिगत रूप से जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया गया था, तो उनके स्थान पर विभागीय अवर सचिव (Under Secretary) ने शपथ पत्र क्यों दाखिल किया। अदालत ने इसे आदेश की अवहेलना के रूप में देखा।

मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए विभाग के सचिव को सख्त निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि सचिव अब किसी अन्य अधिकारी को आगे करने के बजाय स्वयं आगामी 15 जुलाई तक नया और व्यक्तिगत शपथ पत्र दाखिल करें। इसके साथ ही खंडपीठ ने यह भी आदेश दिया कि यदि पिछली सुनवाई के बाद से अब तक जमीन सर्वे के काम में धरातल पर कोई नई प्रगति या सुधार हुआ है, तो उसकी एक-एक विस्तृत जानकारी भी इस हलफनामे में शामिल की जाए।

45 सालों से अधूरा है सर्वे का काम, बढ़ रहे हैं विवाद

इस मामले में राज्य सरकार को घेरते हुए खंडपीठ ने एक बड़ा सवाल पूछा कि झारखंड के सभी जिलों में भूमि सर्वेक्षण का कार्य आखिर कब तक पूरा कर लिया जाएगा? अदालत ने सरकार को इसकी एक स्पष्ट और विस्तृत समय-सीमा कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। अब इस बेहद संवेदनशील मामले की अगली सुनवाई 21 जुलाई को मुकर्रर की गई है।

इससे पहले, याचिकाकर्ता गोकुल चंद की ओर से अदालत को राज्य में जमीन सर्वे के इतिहास और वर्तमान बदहाली से अवगत कराया गया। उनके वकील ने कोर्ट को बताया कि झारखंड के इलाके में आखिरी बार व्यापक और व्यवस्थित भूमि सर्वेक्षण साल 1932 में हुआ था, जिसके खतियान को आज भी कई जगहों पर आधार माना जाता है। इसके बाद साल 1980 में दोबारा नए सिरे से सर्वेक्षण की प्रक्रिया शुरू तो की गई, लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण है कि करीब साढ़े चार दशक (45 साल) बीत जाने के बाद भी यह काम आज तक पूरा नहीं हो सका है। याचिका में साफ कहा गया है कि इस अधूरे और लटके हुए सर्वे के कारण पूरे राज्य में जमीन से जुड़े आपसी विवादों, मुकदमों और प्रशासनिक दिक्कतों में बेतहाशा बढ़ोतरी हो रही है।

सरकार ने गिनाईं उपलब्धियां, पर कोर्ट असंतुष्ट

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार का पक्ष रख रहे वकीलों ने अदालत को आश्वस्त करने की कोशिश की कि राज्य में भूमि सर्वेक्षण का काम रुका नहीं है, बल्कि लगातार जारी है। सरकार की ओर से दावा किया गया कि लातेहार और लोहरदगा जिलों में सर्वे का काम शत-प्रतिशत पूरा कर लिया गया है, जबकि राज्य के शेष अन्य जिलों में यह प्रक्रिया वर्तमान में अलग-अलग चरणों में चल रही है। हालांकि, हाई कोर्ट ने सरकार की इस मौखिक दलील पर पूरी तरह संतुष्ट न होते हुए सर्वे कार्य की वास्तविक प्रगति और उसकी अंतिम समय-सीमा को लेकर लिखित और स्पष्ट जानकारी मांगी है।

WhatsApp Group जुड़ने के लिए क्लिक करें 👉 Join Now
Facebook
X
Threads
WhatsApp
Telegram