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Home»#Trending»‘रिंची’ : झरने, पहाड़ और एक गुमनाम गांव की वैश्विक पहचान
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‘रिंची’ : झरने, पहाड़ और एक गुमनाम गांव की वैश्विक पहचान

By Muzaffar HussainFebruary 24, 20263 Mins Read
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रांची: झारखंड की राजधानी रांची, जिसे ‘पूरब का मैनचेस्टर’ और ‘जलप्रपातों का शहर’ या ‘झरनों का शहर’ भी कहा जाता है, अपनी प्राकृतिक सुंदरता और शांत जलवायु के लिए विश्व प्रसिद्ध है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ‘रांची’ शब्द आखिर आया कहाँ से? इसके पीछे लोककथाओं, भाषाई विकास और औपनिवेशिक इतिहास का एक गहरा संगम है। इसके नाम के पीछे की कहानियाँ किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं हैं। 

‘रिछी’ पक्षी और मुंडा लोककथा

रांची के नामकरण की सबसे प्रचलित कहानियों में से एक ‘रिछी’ पक्षी से जुड़ी है। स्थानीय मुंडा आदिवासियों की परंपरा के अनुसार, इस क्षेत्र में पुराने समय में ‘रिछी’ (एक प्रकार का बाज या शिकारी पक्षी) बहुतायत में पाए जाते थे। मुंडा समुदाय में इस पक्षी को बहुत पवित्र और शुभ माना जाता था। कहा जाता है कि ‘रिछी’ शब्द धीरे-धीरे अपभ्रंश होकर ‘रांची’ बन गया। यह कहानी इस क्षेत्र की जैव-विविधता और आदिवासियों के प्रकृति प्रेम को दर्शाती है।

बांस के जंगलों का प्रभाव : ‘रिंची’ गांव

एक अन्य ऐतिहासिक मत के अनुसार, आज जहां रांची का मुख्य शहर बसा है, वहां कभी ‘रिंची’ नाम का एक छोटा सा गांव हुआ करता था। मुंडा भाषा में ‘अरांची’ (Aranchi) का अर्थ होता है ‘बांस का जंगल’ या ‘बांस का केंद्र’। चूंकि इस इलाके में पहले बांस के सघन जंगल थे, इसलिए स्थानीय लोगों ने इसे अरांची पुकारना शुरू किया। 1834 में जब अंग्रेजों ने इसे प्रशासनिक केंद्र बनाया, तो उनके उच्चारण में ‘अरांची’ बदलकर ‘रांची’ हो गया।

नागवंशी राजाओं की राजधानी

रांची के इतिहास को समझने के लिए नागवंशी राजवंश को जानना जरूरी है। फणी मुकुट राय से लेकर अंतिम राजाओं तक, इस क्षेत्र ने कई राजनीतिक बदलाव देखे। रांची के पास स्थित ‘रातू’ और ‘चुटिया’ जैसे इलाके नागवंशी वैभव के गवाह हैं। जब 1842 में कैप्टन थॉमस विल्किंसन ने छोटानागपुर का मुख्यालय यहाँ स्थानांतरित किया, तब इस गुमनाम गांव को एक शहर के रूप में पहचान मिलने लगी।

अंग्रेजों की पसंद : भारत का समर कैपिटल

रांची की ठंडी जलवायु के कारण अंग्रेजों ने इसे बिहार और ओडिशा प्रांत की ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाया था। अंग्रेजों के लिए रांची केवल एक प्रशासनिक केंद्र नहीं, बल्कि एक ‘हिल स्टेशन’ था। टैगोर हिल, जो गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के बड़े भाई ज्योतिरिंद्रनाथ टैगोर का निवास स्थान था, आज भी रांची की बौद्धिक और ऐतिहासिक विरासत का प्रतीक है।

जलप्रपातों की धरती और पर्यटन

रांची का इतिहास इसके भूगोल के बिना अधूरा है। हुंडरू, जोन्हा और दशम जैसे जलप्रपात केवल पर्यटन स्थल नहीं हैं, बल्कि ये इस पठारी क्षेत्र की प्राचीन भूगर्भीय संरचनाओं के प्रतीक हैं। रांची पठार की ऊँचाई समुद्र तल से लगभग 2100 फीट है, जो इसे झारखंड के अन्य हिस्सों से अलग बनाती है।

बिरसा मुंडा और उलगुलान का केंद्र

रांची का आधुनिक इतिहास भगवान बिरसा मुंडा के बिना पूरा नहीं हो सकता। 19वीं सदी के अंत में, रांची वह केंद्र था जहाँ से ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ ‘उलगुलान’ (महान विद्रोह) की आग सुलगी थी। रांची की पुरानी जेल, जहाँ बिरसा मुंडा ने अंतिम सांस ली, आज एक प्रेरणा स्थल है।

आज की रांची एक स्मार्ट सिटी बनने की राह पर है। यहाँ की एचईसी (Heavy Engineering Corporation) जैसी संस्थाओं ने इसे ‘कारखानों का कारखाना’ का खिताब दिया। रिम्स (RIMS) और आईआईएम (IIM) जैसे संस्थानों ने इसे शिक्षा का हब बना दिया है। लेकिन इन सबके बीच, रांची ने अपनी वह ‘रिछी’ वाली सादगी और बांस के जंगलों वाली हरियाली को आज भी अपने कुछ कोनों में संजो कर रखा है।

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