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रांची: झारखंड विधानसभा के बजट सत्र का तीसरा दिन वैचारिक टकराव और राज्य के मूल मुद्दों की गूँज का गवाह बना। राज्यपाल के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान डुमरी से जेएलकेएम (JLKM) विधायक जयराम महतो ने सदन के भीतर सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों की कार्यशैली पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक संस्था में जनता के ‘असली’ मुद्दों को दरकिनार कर केवल राजनीतिक बयानबाजी की जा रही है।
आंदोलनकारियों का दर्द और अनसुलझे सवाल
जयराम महतो ने भावुक होते हुए कहा कि जिस झारखंड राज्य के लिए हमारे पूर्वजों ने लाठियां खाईं और जेल गए, उनके सपनों का झारखंड आज भी अधूरा है। उन्होंने एक कड़वी हकीकत पेश करते हुए कहा कि राज्य आंदोलन से जुड़े एक तिहाई आंदोलनकारी अब हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उनके परिवार आज भी उस ‘हक’ की तलाश में हैं जिसके लिए यह राज्य बना था। उन्होंने सरकार से मांग की कि राज्य के आंदोलनकारियों और उनके परिजनों के लिए निःशुल्क चिकित्सा सुविधा सुनिश्चित की जाए।
1932 और सरना कोड पर ‘आर-पार’ की बहस
चर्चा के दौरान जयराम महतो ने सरकार को 1932 खतियान आधारित स्थानीय नीति, सरना धर्म कोड और ओबीसी आरक्षण जैसे संवेदनशील विषयों पर घेरा। उन्होंने कहा कि ये केवल चुनावी वादे नहीं, बल्कि राज्य की अस्मिता से जुड़े मुद्दे हैं जिन पर ठोस निर्णय की जरूरत है।
वहीं, सत्ता पक्ष की ओर से राजमहल विधायक एमटी राजा ने बचाव करते हुए कहा कि हेमंत सोरेन सरकार ने पेसा (PESA) कानून लागू कर आदिवासियों को उनका हक दिया है। उन्होंने गेंद केंद्र सरकार के पाले में डालते हुए आरोप लगाया कि विधानसभा से पारित 1932 खतियान और आरक्षण के प्रस्ताव केंद्र के पास लंबित हैं, जिस पर वहां से कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाया जा रहा है। राजा ने आगामी त्योहारों और रमजान के मद्देनजर राज्य में सामाजिक समरसता और शांति बनाए रखने की भी अपील की।

