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रांची: झारखंड के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल जोन्हा फॉल के पास मसरीजारा से हेसलाबेड़ा तक बनने वाली सड़क अब कानूनी पेच और प्रशासनिक सुस्ती के बीच चर्चा का विषय बन गई है। गुरुवार को झारखंड उच्च न्यायालय के चीफ जस्टिस एमएस सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर गहरी नाराजगी जाहिर की।
इंजीनियर पर जुर्माने की तलवार
अदालत ने सख्त लहजे में कहा कि प्रस्तावित सड़क का विस्तृत लेआउट प्लान अब तक पेश क्यों नहीं किया गया? खंडपीठ ने मौखिक रूप से चेतावनी दी कि लापरवाही बरतने वाले जिम्मेदार एग्जीक्यूटिव इंजीनियर पर अदालत भारी जुर्माना भी लगा सकती है। हालांकि, कोर्ट ने नरम रुख अपनाते हुए फिलहाल ऐसा कोई कड़ा आदेश पारित नहीं किया, लेकिन सरकार को एक सप्ताह के भीतर विस्तृत लेआउट प्लान तैयार कर रेलवे को भेजने का अल्टीमेटम दे दिया है।
8 मीटर चौड़ाई का पेंच : क्यों जरूरी है बड़ा विजन?
सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि रेलवे अपनी जमीन पर 5 से 6 मीटर चौड़ी सड़क के लिए सहमत है, लेकिन हाई कोर्ट का विजन बड़ा है। खंडपीठ ने स्पष्ट सुझाव दिया कि इस सड़क की चौड़ाई कम से कम 8 मीटर होनी चाहिए। अदालत का तर्क बेहद व्यावहारिक है चूंकि यह क्षेत्र जोन्हा फॉल जैसे प्रमुख पर्यटन स्थलों से घिरा है, इसलिए 5 मीटर की संकरी सड़क भविष्य में भीषण ट्रैफिक जाम का कारण बनेगी। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि रेलवे की सीमा से बाहर पड़ने वाली जमीन सरकार खुद उपलब्ध कराए ताकि दो गाड़ियां आसानी से एक-दूसरे को पार कर सकें।
रेलवे और सरकार के बीच समन्वय की कमी?
पिछली सुनवाई में कोर्ट ने सरकार को दो सप्ताह का समय दिया था, लेकिन प्रगति शून्य रही। अब रेलवे को भी निर्देश दिया गया है कि लेआउट मिलते ही दो सप्ताह के भीतर एनओसी (NOC) पर निर्णय लें। मामले की अगली सुनवाई 9 अप्रैल को तय की गई है। देखना यह होगा कि क्या एक हफ्ते में सरकारी तंत्र अपनी नींद से जागकर कागजी कार्यवाही पूरी कर पाता है या नहीं।

