India News: उत्तराखंड के धराली कस्बे में भारी बारिश और बाढ़ ने तबाही मचा दी है, जिससे ऐतिहासिक कल्प केदार मंदिर मलबे में दब गया है। यह घटना जलवायु परिवर्तन के गंभीर खतरों को फिर उजागर करती है। खीर गंगा नदी में ऊपरी इलाकों में हुई बारिश के कारण पानी का स्तर बढ़ा, और इसके साथ आए मलबे और पत्थरों ने पूरे कस्बे को बर्बाद कर दिया।

धराली से गंगासागर तक आपदा का खतरा

धराली का कल्प केदार मंदिर कत्यूर शैली में बना था और इसकी बनावट केदारनाथ धाम के समान थी। यह मंदिर गंगोत्री और गौमुख-तपोवन ट्रैक पर जाने वाले पर्यटकों के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। यहां लगभग 60-80 प्रतिशत पर्यटक रुकते थे, जिससे लोगों के लिए रोजगार का एक बड़ा जरिया बना हुआ था। अब मंदिर के नष्ट होने से इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर कई सालों तक नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

आस्था और आजीविका दोनों पर वार

त्रासदी ने फिर अनियंत्रित निर्माण पर सवाल खड़े किए हैं। केदारनाथ में भी इसी तरह की तबाही देखी जा चुकी है। इसके बावजूद, पहाड़ों पर बिना किसी वैज्ञानिक अध्ययन के होमस्टे और अन्य निर्माण कार्य जारी हैं, जो ऐसे खतरों को और बढ़ा रहे हैं। लोगों के अनुसार, कल्प केदार मंदिर कई वर्षों तक जमीन के नीचे दबा रहा था। 1945 के आसपास जब इसकी ऊपरी आकृति दिखाई दी, तब खुदाई शुरू हुई। 12 फीट तक की खुदाई के बाद भी मंदिर का आधा हिस्सा ही जमीन के ऊपर आ पाया था। यह मंदिर पुरातत्व विभाग की सूची में शामिल है और इसके अवशेष 17वीं सदी के बताए जाते हैं।

धराली की त्रासदी ने गंगोत्री की सप्लाई चेन को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। गंगोत्री में कई पर्यटक फंसे हुए हैं और धराली से उनका संपर्क पूरी तरह से टूट गया है। यह स्थिति क्षेत्र में पर्यटन और अन्य सेवाओं पर गहरा असर डालेगी। उत्तराखंड की तरह, पश्चिम बंगाल में स्थित गंगासागर भी बढ़ते समुद्री जलस्तर के खतरे का सामना कर रहा है। यहां स्थित कपिल मुनि आश्रम के सागर में समाने की आशंका हर साल बढ़ती जा रही है। यह आश्रम न केवल लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है, बल्कि काकद्वीप के लोगों के लिए रोजगार का भी जरिया है।

इस आश्रम से जुड़ी पौराणिक कथाओं के अनुसार, कपिल मुनि का मंदिर 1437 में स्वामी रामानंद ने स्थापित किया था। वह मंदिर भी समुद्र में समा गया था। बाद में मंदिर को फिर से बनाया गया, लेकिन वह भी समुद्र में समा गया। वर्तमान मंदिर का निर्माण 1970 के दशक में हुआ था, तब इसकी समुद्र से दूरी लगभग 4 किलोमीटर थी। अब यह दूरी घटकर मात्र 500 मीटर रह गई है। इस बढ़ते खतरे से यहां के लोगों की आस्था और आजीविका दोनों पर संकट मंडरा रहा है।

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