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दुनिया में बढ़ती गर्मी का कहर: हर साल 5.46 लाख लोग बन रहे हैं मौ’त का शिकार

World News: जलवायु परिवर्तन पर जारी एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट ने दुनिया को झकझोर दिया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि 2012 से 2021 के बीच हर साल औसतन 5,46,000 लोग गर्मी की लपटों की वजह से अपनी जान गंवा रहे हैं। 1990 के बाद

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World News: जलवायु परिवर्तन पर जारी एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट ने दुनिया को झकझोर दिया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि 2012 से 2021 के बीच हर साल औसतन 5,46,000 लोग गर्मी की लपटों की वजह से अपनी जान गंवा रहे हैं। 1990 के बाद से यह आंकड़ा 63 प्रतिशत बढ़ गया है, जो वैश्विक तापमान में तेजी से हुए इजाफे की भयावह कीमत को दर्शाता है।

2024: अब तक का सबसे गर्म साल

विश्लेषण के अनुसार, 2024 में पृथ्वी का औसत वार्षिक तापमान औद्योगिक युग की तुलना में 1.5 डिग्री सेल्सियस ज्यादा रहा। रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल हर व्यक्ति ने औसतन 16 दिन “खतरनाक तापमान” झेला, जबकि बच्चों और बुजुर्गों को लगभग 20 दिन तक अत्यधिक गर्मी सहनी पड़ी। विशेषज्ञों का कहना है यह पिछले दो दशकों के मुकाबले चार गुना वृद्धि है।

प्राकृतिक आपदाओं और बीमारियों में उछाल

रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि बढ़ती गर्मी के साथ अन्य आपदाएं भी तेज हुई हैं। दुनिया के 64 प्रतिशत इलाकों में अत्यधिक बारिश के दिन बढ़ गए हैं, जिससे बाढ़ और भूस्खलन का खतरा तीन गुना बढ़ा है। 61 प्रतिशत वैश्विक भूमि क्षेत्र 2024 में गंभीर सूखे से प्रभावित हुआ, जबकि जंगल की आग से निकले धुएं के कारण अकेले 1.54 लाख लोगों की मौत अनुमानित है।

स्वास्थ्य व्यवस्था पर दबाव और सरकारी खर्च का बोझ

रिपोर्ट बताती है कि 2023 में सरकारों ने जीवाश्म ईंधनों पर 956 अरब डॉलर खर्च किए — यह रकम जलवायु प्रभावित देशों को दी जाने वाली मदद से तीन गुना अधिक थी। 15 देशों ने अपने राष्ट्रीय स्वास्थ्य बजट से ज्यादा पैसा फॉसिल ईंधन पर खर्च किया। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के डॉ. जेरेमी फैरर ने कहा कि “अब जलवायु संकट सीधा स्वास्थ्य संकट बन चुका है। साफ हवा, पोषक भोजन और मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था ही लाखों जानें बचा सकती है।”

चेतावनी की घड़ी

यह रिपोर्ट आगामी सीओपी 30 जलवायु सम्मेलन (ब्राजील) से पहले जारी की गई है और दुनिया को याद दिलाती है कि निष्क्रियता अब मौत बन रही है — न केवल तापमान में, बल्कि मानवता के अस्तित्व में भी।

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