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World News: पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश इस वक्त इतिहास के सबसे काले और खौफनाक दौर से गुजर रहा है। राजधानी ढाका की गलियों में अब शांति नहीं, बल्कि गोलियों की गूँज सुनाई देती है। मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के 15 महीनों के कार्यकाल में हिंसा का जो नंगा नाच शुरू हुआ है, उसने पूरे देश को ‘लाशों के ढेर’ पर लाकर खड़ा कर दिया है। सरकारी आंकड़ों की मानें तो इस दौरान करीब 5,000 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इससे कहीं ज्यादा भयावह बताई जा रही है।
कट्टरपंथियों का कब्जा और लूटे गए हथियारों का आतंक
अगस्त 2024 में हुए तख्तापलट के दौरान थानों से लूटे गए अत्याधुनिक हथियार आज अपराधियों और कट्टरपंथी गुटों के पास हैं। सुरक्षा विशेषज्ञों की मानें तो यही लूटे हुए हथियार अब आम जनता और अल्पसंख्यकों के लिए काल बन रहे हैं। ढाका का धानमंडी-32 इलाका, जो कभी देश की शान हुआ करता था, अब उपद्रवियों का केंद्र बन चुका है। उस्मान हादी की मौत के बाद भड़की चिंगारी ने पूरे शहर को सुलगा दिया है। आलम यह है कि अपराधी दिनदहाड़े व्यापारियों और नेताओं को मौत के घाट उतार रहे हैं और पुलिस मूकदर्शक बनी हुई है।
हिंदू-ईसाई निशाने पर; चुनाव के भविष्य पर मंडराया संकट
सबसे चिंताजनक स्थिति हिंदू और ईसाई जैसे अल्पसंख्यक समुदायों की है, जो लगातार कट्टरपंथियों के निशाने पर हैं। फरवरी 2026 में होने वाले आम चुनावों से पहले ही लोकतंत्र की उम्मीदें दम तोड़ती नजर आ रही हैं। खौफ का आलम यह है कि कई संभावित उम्मीदवारों ने अपनी जान के खतरे को देखते हुए चुनाव लड़ने से ही हाथ पीछे खींच लिए हैं। पुराने ढाका से लेकर चटगांव तक, अपराधियों ने अपना समानांतर नेटवर्क खड़ा कर लिया है, जिससे कानून-व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है।
क्या शांतिपूर्ण चुनाव करा पाएंगे मोहम्मद यूनुस?
हालांकि सरकार यह दावा कर रही है कि वह हथियारों के खिलाफ अभियान चला रही है, लेकिन हकीकत में प्रशासन की पकड़ ढीली पड़ती जा रही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी उदार छवि रखने वाले मोहम्मद यूनुस के लिए घर के भीतर के हालात संभालना अब टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। अगर समय रहते इन सशस्त्र अपराधियों और कट्टरपंथी गुटों पर लगाम नहीं कसी गई, तो बांग्लादेश का यह संकट पूरे दक्षिण एशिया की शांति के लिए बड़ा खतरा बन सकता है।

