New Delhi: अंटार्कटिका की विशाल बर्फीली चादर के बीच एक ऐसा प्राकृतिक अजूबा मौजूद है जो पहली नजर में किसी खौफनाक या काल्पनिक फिल्म के दृश्य जैसा नजर आता है। टेलर ग्लेशियर से निकलकर लेक बोनी में गिरने वाले इस झरने को ‘ब्लड फॉल्स’ यानी खून का झरना कहा जाता है।
करीब पांच मंजिला इमारत जितना ऊंचा यह झरना गहरे लाल रंग का पानी उगलता है, जो आसपास फैली सफेद बर्फ पर किसी खून की धारा की तरह दिखाई देता है। साल 1911 में प्रसिद्ध भूवैज्ञानिक थॉमस ग्रिफिथ टेलर ने सबसे पहले इस अद्भुत स्थान की खोज की थी। दशकों तक वैज्ञानिक यह मानते रहे कि पानी का यह गहरा लाल रंग किसी खास तरह की लाल शैवाल या माइक्रो-एलगी के कारण है, लेकिन आधुनिक शोधों ने इस पुरानी धारणा को पूरी तरह से खारिज कर दिया है।
लाल रंग और ऑक्सीकरण का रहस्य
वैज्ञानिक अध्ययनों से यह साबित हुआ है कि ब्लड फॉल्स के पानी का लाल रंग न तो किसी जैविक रंगद्रव्य की वजह से है और न ही इसमें वास्तविक खून की कोई मिलावट है। इसका असली रहस्य पानी के रासायनिक संगठन में छिपा है। दरअसल, टेलर ग्लेशियर के करीब 400 मीटर नीचे लाखों साल पुराना एक अत्यंत खारा जल भंडार या उप-ग्लेशियल झील मौजूद है। जब अंटार्कटिका का यह हिस्सा प्राचीन काल में ग्लेशियरों से ढका, तो समुद्र का खारा पानी अंदर ही कैद होकर रह गया।
इस पानी में लोहे (आयरन) की मात्रा असाधारण रूप से बहुत ज्यादा है। जब बर्फ की हलचल और अंदरूनी दबाव के कारण यह लोहे से भरपूर पानी ग्लेशियर की दरारों से बाहर निकलता है और हवा की ऑक्सीजन के संपर्क में आता है, तो उसमें तुरंत ऑक्सीकरण यानी जंग लगने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। यह वही रासायनिक प्रक्रिया है जिससे लोहा हवा के संपर्क में आकर लाल-भूरे रंग का हो जाता है।
माइनस-19 डिग्री में भी क्यों नहीं जमता पानी?
रिपोर्ट के मुताबिक, एक और दिलचस्प सवाल यह है कि अंटार्कटिका के माइनस-19 डिग्री सेल्सियस जैसे भीषण तापमान में भी यह पानी जमता क्यों नहीं है? इसका सीधा उत्तर पानी की अत्यधिक लवणता यानी खारापन है। इस उप-ग्लेशियल झील के पानी में साधारण समुद्री पानी की तुलना में तीन से चार गुना ज्यादा नमक मौजूद है।
अत्यधिक नमक पानी के जमने के बिंदु (फ्रीजिंग पॉइंट) को बहुत नीचे धकेल देता है, जिससे शून्य से कई डिग्री नीचे तापमान होने के बावजूद यह पानी हमेशा द्रव रूप में बहता रहता है। वैज्ञानिकों ने रडार इमेजिंग के जरिए यह भी खोज निकाला है कि इस अंधेरी, बिना ऑक्सीजन वाली और अत्यधिक खारी झील के अंदर भी सूक्ष्मजीवों का एक अनूठा संसार फल-फूल रहा है। ये बैक्टीरिया बिना सूर्य के प्रकाश के केवल लोहे और सल्फर के रासायनिक चक्र से ऊर्जा प्राप्त कर जीवित रहते हैं, जो पृथ्वी पर जीवन की अद्भुत क्षमता का सबसे बड़ा उदाहरण है।







