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Washington : अमेरिका की राजनीति और न्याय व्यवस्था में हलचल मच गई है। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की वफादार वकील अलीना हब्बा की अमेरिकी अटॉर्नी के रूप में नियुक्ति को लेकर अदालत ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
पेंसिलवेनिया के मध्य जिले के संघीय न्यायाधीश मैथ्यू डब्ल्यू. ब्रैन ने अपने फैसले में कहा कि हब्बा के पास न्यू जर्सी जिले में अमेरिकी अटॉर्नी का कार्यभार संभालने का कानूनी अधिकार ही नहीं है। जज ब्रैन ने टिप्पणी की कि इस तरह की गैर-कानूनी नियुक्ति से पहले से ही जटिल संघीय न्यायिक प्रणाली और अधिक अव्यवस्थित हो गई है।
अयोग्य घोषित करने की सिफारिश
न्यायाधीश ने कहा कि चूंकि हब्बा इस पद पर कार्य करने की योग्य नहीं हैं, इसलिए उन्हें किसी भी चल रहे मामले में भाग लेने से अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए। हालांकि, उन्होंने अपने आदेश के तत्काल प्रभाव को स्थगित कर दिया, जिससे सरकार को अपील अदालत में हब्बा की ओर से पैरवी करने का अवसर मिल सके।
विवादित नियुक्ति और कार्यकाल का मसला
41 वर्षीय अलीना हब्बा, जो ट्रंप की निजी वकील रह चुकी हैं, को इस साल मार्च में 120 दिन के लिए अंतरिम अमेरिकी अटॉर्नी नियुक्त किया गया था। बाद में ट्रंप प्रशासन ने उन्हें स्थायी पद के लिए नामित किया, लेकिन न्यू जर्सी के सीनेटरों ने इस नियुक्ति पर आपत्ति जताई और उनका कार्यकाल बढ़ाने से इनकार कर दिया। इसके बाद संघीय न्यायाधीशों के एक पैनल ने भी उनका कार्यकाल आगे नहीं बढ़ाया और अनुभवी अभियोजक डेज़ीरी एल. ग्रेस को कार्यभार सौंप दिया।
अचानक पदोन्नति और कानूनी चुनौती
मामला यहीं नहीं थमा। अमेरिकी अटॉर्नी जनरल पाम बॉन्डी ने न्यायाधीशों के फैसले की कड़ी आलोचना की और ग्रेस को पद से हटा दिया। इसके बाद हब्बा को कार्यवाहक अमेरिकी अटॉर्नी के पद पर पदोन्नत कर दिया गया। इसी नियुक्ति की वैधता को लेकर दो याचिकाएं अदालत में दायर की गईं।
वकीलों ने फैसले का स्वागत किया
याचिकाकर्ता वकील जेराल्ड क्रोवाटिन और एब्बे डी. लोवेल ने फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि अभियोजकों के पास अत्यधिक शक्ति होती है और यह बेहद जरूरी है कि वे कानूनी रूप से योग्य और सही तरीके से नियुक्त किए जाएं। उन्होंने कोर्ट के निर्णय को न्याय व्यवस्था की मजबूती के लिए अहम बताया।
इस पूरे विवाद ने न केवल ट्रंप प्रशासन के फैसलों को कटघरे में खड़ा किया है बल्कि यह भी साफ कर दिया है कि अमेरिकी न्यायपालिका राजनीतिक दबावों से ऊपर उठकर निष्पक्षता बरतने को तैयार है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर बड़े कानूनी और राजनीतिक टकराव की संभावना है।


विवादित नियुक्ति और कार्यकाल का मसला