Kabul: अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच लगातार बढ़ते कूटनीतिक और सैन्य तनाव के बीच तालिबान के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बेहद गंभीर और सनसनीखेज आरोप लगाया है। नूरिस्तान प्रांत के तालिबान गवर्नर जैनुलआबेदीन आबिद ने एक पॉडकास्ट में दावा किया कि अमेरिका ने अफगानिस्तान में तालिबान हुकूमत को गिराने और देश में अस्थिरता फैलाने का पूरा काम पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई (ISI) को सौंप रखा है। उन्होंने आरोप लगाया कि आईएसआई अफगान धरती पर तालिबान सरकार के विरोधियों को वित्तीय और सैन्य सहायता प्रदान कर रही है। हालांकि, इस दावे के समर्थन में अब तक कोई स्वतंत्र या आधिकारिक साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए हैं।
सीमा विवाद और टीटीपी को लेकर दोनों देशों में तनातनी
यह बयान ऐसे समय में आया है जब काबुल और इस्लामाबाद के बीच द्विपक्षीय संबंध अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुके हैं। सीमा सुरक्षा और डूरंड लाइन के आसपास सक्रिय सशस्त्र समूहों को लेकर दोनों देशों के बीच लंबे समय से तनातनी जारी है। तालिबान जहां पाकिस्तान पर अपने आंतरिक मामलों में अनुचित हस्तक्षेप करने का आरोप लगाता है, वहीं पाकिस्तान का कहना है कि अफगान सरजमीं से संचालित होने वाले आतंकी उसके देश की सुरक्षा के लिए सीधा खतरा बने हुए हैं।
टीटीपी के सुरक्षित ठिकानों को लेकर पाकिस्तान का सख्त रुख
दूसरी ओर, पाकिस्तान अपनी आंतरिक सुरक्षा चिंताओं को लेकर तालिबान सरकार के खिलाफ लगातार आक्रामक रुख अपनाए हुए है। इस्लामाबाद का मुख्य आरोप है कि प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के शीर्ष कमांडर और लड़ाके अफगान सरजमीं पर बने सुरक्षित ठिकानों से अपनी गतिविधियां चला रहे हैं। पाकिस्तान के अनुसार, टीटीपी के आतंकवादी अफगानिस्तान में बैठकर पाकिस्तानी सुरक्षा बलों और आम नागरिकों पर घातक हमलों की साजिश रचते हैं, जबकि तालिबान प्रशासन उनके खिलाफ कोई ठोस दंडात्मक कार्रवाई करने में असमर्थ या अनिच्छुक रहा है।
आरोपों को खारिज कर रहा तालिबान, गहराया क्षेत्रीय संकट
तालिबान सरकार पाकिस्तान के इन सभी दावों और आरोपों को सिरे से खारिज करती आई है। अफगान विदेश और गृह मंत्रालय का कहना है कि वे अपनी भूमि का उपयोग किसी भी पड़ोसी देश या तीसरे पक्ष के विरुद्ध आतंकवाद फैलाने के लिए नहीं होने देने के अपने संकल्प पर पूरी तरह कायम हैं। दोनों देशों द्वारा एक-दूसरे पर लगाए जा रहे इन तीखे आरोपों ने मध्य और दक्षिण एशिया में कूटनीतिक दूरी को और बढ़ा दिया है, जिससे क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता पर नए सवाल खड़े हो गए हैं।




