पूर्वी सिंहभूम: देश की प्राकृतिक धरोहरों, पहाड़ों और नदियों के अस्तित्व को बचाने के लिए झारखंड की लौहनगरी जमशेदपुर में एक बड़ा ऐतिहासिक कदम उठाया जा रहा है। शहर में आगामी 22 और 23 मई को आयोजित होने वाले दो दिवसीय ‘पहाड़ एवं नदी पर राष्ट्रीय सम्मेलन’ से ठीक पहले, इसके आयोजन समिति ने पहाड़ों और नदियों के संरक्षण से जुड़े एक बेहद महत्वपूर्ण और प्रस्तावित विधेयक (विधेयक प्रारूप) का ड्राफ्ट सार्वजनिक कर दिया है।
सम्मेलन के संरक्षक व जमशेदपुर पश्चिम के प्रखर विधायक सरयू राय और सम्मेलन के संयोजक दिनेश मिश्र ने मंगलवार को संयुक्त रूप से प्रेस वार्ता के दौरान इस ऐतिहासिक प्रारूप को जारी किया। इस ड्राफ्ट को देशभर से सम्मेलन में हिस्सा लेने आ रहे पर्यावरणविदों, वैज्ञानिकों और प्रतिनिधियों को भी भेजा जा रहा है, ताकि वे इसका गहराई से अध्ययन कर सम्मेलन के दौरान अपने अमूल्य सुझाव और संशोधन प्रस्तुत कर सकें। व्यापक विचार-विमर्श और जरूरी संशोधनों के बाद, इस विधेयक के अंतिम रूप को भारत सरकार के पास अधिनियमित (कानून बनाने) करने के लिए भेजा जाएगा।
पारिस्थितिक तंत्र की रक्षा और सतत प्रबंधन पर जोर
प्रस्तावित ‘भारतीय पर्वत संरक्षण, संरक्षण एवं संवर्धन विधेयक, 2026’ का मुख्य उद्देश्य देश के संवेदनशील पर्वतीय पारिस्थितिक तंत्र (Mountain Ecosystem) की रक्षा, संवर्द्धन और उनका सतत प्रबंधन सुनिश्चित करना है। इस विधेयक में पर्वतों को मात्र जमीन का टुकड़ा न मानकर, उन्हें पारिस्थितिक, सांस्कृतिक और सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण राष्ट्रीय संपदा का दर्जा दिया गया है। इसके कानूनी दायरे में हिमालय, पश्चिमी घाट, अरावली, विंध्य, सतपुड़ा और नीलगिरि समेत देश की सभी प्रमुख पर्वत श्रृंखलाओं को शामिल करने का प्रस्ताव है।
तीन श्रेणियों में बंटेंगे पर्वतीय क्षेत्र, उल्लंघन पर होगा कड़ा दंड
विधेयक के ड्राफ्ट में पर्वतीय क्षेत्रों को तीन मुख्य भागों— मुख्य संरक्षण क्षेत्र, विनियमित बफर क्षेत्र और सतत उपयोग क्षेत्र में वर्गीकृत करने का प्रावधान किया गया है। इसके तहत सबसे संवेदनशील यानी ‘मुख्य संरक्षण क्षेत्रों’ में बड़े पैमाने पर होने वाले खनन (Mining), वनों की अंधाधुंध कटाई, बड़े बांधों के निर्माण, नदियों से रेत उत्खनन और पर्यावरण को स्थायी नुकसान पहुंचाने वाली अन्य व्यावसायिक गतिविधियों पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगाने का कड़ा प्रस्ताव है। वहीं, पर्यटन, सड़क निर्माण और जलविद्युत जैसी आवश्यक परियोजनाओं के लिए पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) और स्थानीय समाज से परामर्श करना अनिवार्य होगा।
स्थानीय आदिवासियों को मिलेंगे विशेष अधिकार
इस प्रारूप में जल, जंगल और जमीन से जुड़े स्थानीय व आदिवासी समुदायों की भागीदारी को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। वनाधिकार अधिनियम, 2006 के तहत आदिवासियों को मिले अधिकारों को पूरी तरह सुरक्षित रखते हुए, उनके पारंपरिक ज्ञान को बढ़ावा देने की बात कही गई है। साथ ही, राष्ट्रीय पर्वत संरक्षण प्राधिकरण और एक विशेष पर्वत संरक्षण कोष (Mountain Conservation Fund) की स्थापना का भी खाका तैयार किया गया है, जिसके तहत नियमों का उल्लंघन करने वालों के लिए कठोर दंड और भारी जुर्माने का प्रावधान है।



