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स्वामित्व तय करना रजिस्ट्रार का काम नहीं, प्रतिबंधित जमीन सूची हटाने के हाईकोर्ट आदेश का स्वागत

जमीन रजिस्ट्री पर झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, झारखंड चैंबर ने बताया ऐतिहासिक कदम, लैंड रिफॉर्म्स को मिलेगा बल

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रांची: झारखंड हाईकोर्ट द्वारा नेशनल जेनरिक डॉक्यूमेंट रजिस्ट्रेशन सिस्टम (NGDRS) पोर्टल से प्रतिबंधित जमीनों की सूची को तत्काल प्रभाव से हटाने के निर्देश का झारखंड चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज ने जोरदार स्वागत किया है। झारखंड चैंबर की लैंड रिफॉर्म सब-कमेटी के चेयरमैन मुकेश अग्रवाल ने अदालत के इस निर्णय को राज्य में पारदर्शी निबंधन व्यवस्था और भूमि सुधारों की दिशा में एक युगांतरकारी व स्वागतयोग्य कदम करार दिया।
मुकेश अग्रवाल ने कानूनी पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यदि किसी जमीन के दस्तावेज निबंधन अधिनियम, 1908 और बिहार निबंधन नियमावली, 1937 के सभी वैधानिक प्रावधानों व शर्तों को पूरा करते हैं, तो केवल किसी आंतरिक या प्रतिबंधित सूची में नाम दर्ज होने के आधार पर रजिस्ट्री से इनकार करना सर्वथा अनुचित है। उन्होंने स्पष्ट किया कि निबंधन (रजिस्ट्री) अधिकारियों का प्राथमिक दायित्व केवल दस्तावेजों की वैधानिक प्रक्रिया का पालन कराना और उनका निबंधन करना है। जमीन के वास्तविक स्वामित्व या मालिकाना हक का निर्धारण करना रजिस्ट्रार या सब-रजिस्ट्रार के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। यदि संपत्ति के मालिकाना हक को लेकर कोई विवाद है, तो उसका निपटारा केवल सक्षम सिविल न्यायालय द्वारा ही किया जा सकता है।
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि प्रभावित रैयतों और जमीन मालिकों को बिना कोई पूर्व सूचना या सुनवाई का अवसर दिए उनकी जमीन को एकतरफा प्रतिबंधित सूची में डाल देना प्राकृतिक न्याय के मूल सिद्धांतों का सीधा उल्लंघन है। वर्षों से इस मनमानी व्यवस्था के कारण आम जनता, मध्यमवर्गीय परिवारों और व्यापारियों को भारी मानसिक प्रताड़ना, आर्थिक क्षति और अनावश्यक कानूनी मुकदमों का सामना करना पड़ रहा था।
झारखंड चैंबर ने राज्य सरकार से मांग की है कि हाईकोर्ट के इस आदेश का सभी जिलों में अविलंब और कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित कराया जाए, ताकि पूरे राज्य में एक समान, निष्पक्ष और पारदर्शी निबंधन प्रणाली प्रभावी हो सके। इसके साथ ही, लंबे समय से लंबित खासमहल भूमि सहित जमीन से जुड़े अन्य जटिल विषयों पर भी सरकार को एक स्पष्ट, व्यावहारिक और जनहितैषी नीति बनानी चाहिए। मुकेश अग्रवाल ने विश्वास जताया कि अदालत के इस हस्तक्षेप से राज्य में जमीन की खरीद-बिक्री में आ रहे गतिरोध दूर होंगे, रियल एस्टेट व व्यापार को गति मिलेगी और नागरिकों को अनावश्यक प्रशासनिक अड़चनों से मुक्ति मिलेगी।
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