Patna: पारंपरिक लकीर की फकीर बनी खेती को अब आधुनिक विज्ञान और तकनीक का साथ मिल गया है। ‘आत्मा’ के जरिए मिल रहे प्रशिक्षण और अनुदान ने बिहार के किसानों का आत्मविश्वास सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है। मधेपुरा का पपीता हो या वैशाली की प्राकृतिक फसलें… यह इस बात की गवाही दे रहे हैं कि अगर सही दिशा और तकनीक मिल जाए, तो किसानी में ही कुबेर का खजाना छिपा है।
किसान पाठशाला, खेतों पर व्यावहारिक प्रदर्शन (डेमोंस्ट्रेशन) और दूसरे राज्यों के एक्सपोजर विजिट ने बिहार के किसानों की सोच और सूरत दोनों बदल दी है। आइए, जानते हैं मधेपुरा और वैशाली के उन प्रगतिशील किसानों की कहानी, जिन्होंने ‘आत्मा’ की मदद से अपनी तकदीर बदल ली है।
मधेपुरा के सुधीर कुमार: पपीते की खेती से हो रही बंपर कमाई
मधेपुरा जिले के रहने वाले सुधीर कुमार ने ‘आत्मा’ के माध्यम से कृषि का तकनीकी प्रशिक्षण लिया और सरकार से मिलने वाले अनुदान का लाभ उठाया। पारंपरिक फसलों से इतर उन्होंने व्यावसायिक खेती का रुख किया और आज वे मालामाल हो रहे हैं।
पपीते की बंपर पैदावार: सुधीर वैज्ञानिक तरीके से पपीते के पौधों को उचित दूरी पर लगाते हैं और समय पर सिंचाई करते हैं। इसकी खूबी यह है कि एक बार पौधे लगाने पर लगातार तीन साल तक फल मिलते हैं।
लंबा मुनाफा: वे पपीते को बड़े-बड़े बाजारों में बेचते हैं। फसल जल्दी खराब न होने के कारण उन्हें बाजार में अच्छे दाम मिलते हैं। सुधीर बताते हैं कि बाजार भाव के हिसाब से उन्हें कभी ढाई लाख रुपये तो कभी डेढ़ लाख रुपये तक की शानदार आमदनी हो जाती है।
वैशाली के विनय कुमार सिंह: प्राकृतिक खेती से सुधार रहे जमीन की सेहत
वैशाली जिले के मनोरा गांव के रहने वाले विनय कुमार सिंह ने ‘आत्मा’ से प्राकृतिक खेती की बारीकियां सीखीं। रासायनिक खादों से तौबा कर उन्होंने पूरी तरह जैविक और प्राकृतिक तौर-तरीके अपना लिए हैं:
मिट्टी की सुरक्षा: वे खेती में यूरिया-डीएपी की जगह केंचुआ खाद, वर्मी कम्पोस्ट और नीम की खली का इस्तेमाल कर रहे हैं।
बढ़िया क्वालिटी और मुनाफा: प्राकृतिक खेती अपनाने से उनकी फसलें बेहद स्वस्थ और बेहतरीन गुणवत्ता वाली होती हैं। विनय बताते हैं कि लागत कम आती है और फसल की बंपर पैदावार के साथ-साथ बाजार में मुनाफा भी बहुत बेहतर मिल रहा है।
दूसरे राज्यों में जाकर सीख रहे आधुनिक खेती की तकनीक
‘आत्मा’ सिर्फ जिले की हद तक सीमित नहीं है, बल्कि किसानों को नई तकनीक सिखाने के लिए उनका दायरा बहुत बड़ा कर चुकी है:
एक्सपोजर विजिट और ट्रेनिंग: किसानों को जिले के अंदर, राज्य के अन्य जिलों और बिहार के बाहर भी अध्ययन दौरों (Exposure Visits) पर भेजा जाता है।
विशेषज्ञों से सीख: दूसरे राज्यों में जाकर किसान वहां के सफल किसानों और कृषि वैज्ञानिकों से सीधे रूबरू होते हैं। बागवानी, ड्रिप सिंचाई और आधुनिक कृषि के गुर सीखकर वे अपने खेतों में वही फॉर्मूला लागू करते हैं, जिससे बंजर जमीन से भी सोना उगने लगा है।




