Ankara, Turkey: सऊदी अरब के साथ हुए सामरिक ‘मक्का समझौते’ को लेकर तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन घरेलू मोर्चे पर भारी राजनीतिक विरोध के घेरे में आ गए हैं। इस बीच, समझौते की शर्तों का पालन करते हुए पाकिस्तान ने सऊदी अरब में अपने हजारों सैनिक और एयरफोर्स का एक स्क्वाड्रन तैनात कर दिया है, जिससे क्षेत्रीय राजनीति में सरगर्मी और तेज हो गई है। तुर्की के विपक्षी दलों ने संसद को दरकिनार कर विदेश में सैन्य बल भेजने के इस कदम पर राष्ट्रपति एर्दोगन के खिलाफ कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है।
क्या है मक्का समझौता और ताजा विवाद?
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, विवादित ‘मक्का समझौते’ पर बीते 7 अगस्त को तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन, सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने हस्ताक्षर किए थे। इसके बाद, 5 अक्टूबर को रियाद में हुई एक आपातकालीन बैठक के दौरान इसे लागू करने पर औपचारिक सहमति बनी। इस सहमति के तुरंत बाद पाकिस्तान ने अपने सैनिक और वायु सेना के दस्ते सऊदी अरब रवाना कर दिए।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम पर तुर्की के भीतर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। तुर्की की मुख्य विपक्षी पार्टी ‘न्यू पार्टी’ के नेता ओजगुर ओजेल (Ozgur Ozel) ने इस बात पर कड़ा ऐतराज जताया है कि इस अहम रक्षा समझौते को अभी तक देश की संसद यानी ग्रैंड नेशनल असेंबली की मंजूरी क्यों नहीं दी गई है।
विपक्ष के गंभीर आरोप और ऐतिहासिक चिंताएं
विपक्षी नेता ओजगुर ओजेल ने सरकार पर सीधा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि एर्दोगन प्रशासन संसद को भरोसे में लिए बिना और उससे पूछे बिना ही तुर्की के सैनिकों को विदेश भेजने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। विपक्ष का तर्क है कि पहले से ही किसी संघर्ष या युद्ध में शामिल देश के साथ इस तरह का रक्षा समझौता करना, तुर्की को भी अनचाहे रूप से उस भू-राजनीतिक संघर्ष का हिस्सा बना सकता है।
ओजेल ने इस बात पर जोर दिया कि संवैधानिक नियमों के अनुसार तुर्की की सेना को देश की सीमाओं से बाहर भेजने के लिए संसद की अनुमति लेना अनिवार्य है। उन्होंने कड़े शब्दों में चेताया कि करीब 100 साल बाद तुर्की के सैनिकों को फिर से यमन भेजने की किसी भी कोशिश को देश का विपक्ष कतई स्वीकार नहीं करेगा।
सरकार और संसद के अधिकारों की जंग
यह पूरा विवाद इस बात को लेकर है कि संकट के समय या शांति रक्षा के नाम पर विदेश में सैनिक भेजने का अंतिम अधिकार कार्यकारी सरकार (Executive) के पास होना चाहिए या संसद (Legislature) के पास।
हालाँकि, नाटो (NATO) सदस्यता के मामले में स्थिति अलग है क्योंकि तुर्की साल 1952 से इसका सदस्य है और वहां आपसी संधियों पर पहले से सहमति बनी हुई है, इसलिए वहां ऐसे सवाल नहीं उठते। फिर भी, जानकारों का मानना है कि नाटो का आर्टिकल 5 भी किसी देश पर स्वतः या स्वचालित सैन्य कार्रवाई (Automatic Action) की अनुमति नहीं देता, बल्कि हर सदस्य देश वही कदम उठाता है जिसे वह अपने राष्ट्रीय हित में आवश्यक समझे। घरेलू संसद को दरकिनार करने के इस विवाद ने तुर्की की राजनीति में भूचाल ला दिया है और राष्ट्रपति एर्दोगन के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं।




