Mumbai: 1993 के मुंबई सिलसिलेवार बम धमाकों के गुनहगार और अंडरवर्ल्ड डॉन अबू सालेम को देश की सर्वोच्च अदालत से बड़ा झटका लगा है। बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सालेम की समय पूर्व रिहाई और सजा में छूट की मांग वाली याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया है। शीर्ष अदालत के इस सख्त रुख के बाद अब सालेम के समय से पहले जेल से बाहर आने की तमाम कानूनी उम्मीदें खत्म हो गई हैं।
सुप्रीम कोर्ट से अबू सालेम को झटका: दलीलें और कानूनी पहलू
जेल में अच्छे आचरण और भुगती जा चुकी सजा की अवधि का हवाला देकर सालेम ने फरवरी 2025 में याचिका दाखिल की थी। बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा अप्रैल 2026 में याचिका रद्द किए जाने के बाद उसने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन अदालत ने उसकी किसी दलील को स्वीकार नहीं किया।
केंद्र और महाराष्ट्र सरकार ने किया था कड़ा विरोध
अदालत में केंद्र सरकार और महाराष्ट्र सरकार दोनों ने सालेम की रिहाई का पुरजोर विरोध किया। महाराष्ट्र कारागृह विभाग के अतिरिक्त महानिदेशक सुहास वरके द्वारा दाखिल हलफनामे में सालेम के गंभीर आपराधिक इतिहास का उल्लेख किया गया।
अभियोजन पक्ष ने स्पष्ट किया कि सालेम के खिलाफ आतंकवाद, हत्या, साजिश और जबरन वसूली जैसे जघन्य मामले दर्ज हैं। ऐसे खतरनाक पृष्ठभूमि वाले अपराधी को महज जेल में सामान्य आचरण के आधार पर किसी भी प्रकार की विशेष छूट या रियायत नहीं दी जा सकती।
पुर्तगाल प्रत्यर्पण संधि और 25 साल की कानूनी शर्त
नवंबर 2005 में पुर्तगाल से प्रत्यर्पित कर भारत लाए गए सालेम ने भारत-पुर्तगाल समझौते की उस शर्त का हवाला दिया था, जिसके तहत उसे 25 वर्ष से अधिक सजा नहीं दी जा सकती। सालेम की गणना के अनुसार 25 वर्ष की मियाद 10 नवंबर 2030 को पूरी होगी।
उसने दावा किया था कि पिछले करीब 20 वर्षों की कैद और नियमानुसार मिलने वाली छूट को जोड़कर उसकी प्रभावी सजा पूरी मानी जाए। हालांकि, अदालत ने अपराधों की गंभीरता को देखते हुए इस तर्क को सिरे से नकार दिया।
2030 तक सलाखों के पीछे ही रहना होगा
सर्वोच्च न्यायालय के इस अंतिम फैसले से साफ हो गया है कि सालेम को प्रत्यर्पण समझौते के तहत निर्धारित 25 वर्ष की पूरी अवधि जेल में काटनी होगी।
वर्ष 2030 से पहले रिहाई की उसकी कानूनी कोशिशें अब पूरी तरह निष्फल हो चुकी हैं और उसे फिलहाल जेल में ही अपनी शेष सजा भुगतनी पड़ेगी।




