Patna: सावन के पवित्र महीने की शुरुआत के साथ ही बिहार की धरती ‘बोल बम’ और ‘हर-हर महादेव’ के दिव्य जयकारों से गूंज रही है। सुल्तानगंज से जल भरकर देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम की ओर कदम बढ़ा रहे लाखों कांवरियों के लिए इस बार बिहार की सीमा केवल एक धार्मिक मार्ग नहीं, बल्कि सेवा और आतिथ्य का केंद्र बन गई है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल और झारखंड जैसे दूर-दराज के राज्यों से आए श्रद्धालु राज्य सरकार द्वारा किए गए बेहतर इंतजामों से बेहद अभिभूत और गदगद नजर आ रहे हैं।
यूपी के श्रद्धालुओं ने सरकार के इंतजामों को सराहा
उत्तर प्रदेश के कौशांबी से आए श्रद्धालु अजित पटेल ने पटना से देवघर की अपनी यात्रा के दौरान बिहार सरकार का बारंबार धन्यवाद किया। उन्होंने बताया कि बिहार में प्रवेश करने के बाद कांवरियों के लिए की गई विशेष सुविधाओं और श्रद्धालुओं पर ऊपर से हुई पुष्प वर्षा ने उनका दिल जीत लिया है। उन्होंने कहा कि बाबा भोलेनाथ के प्रति असीम श्रद्धा के साथ-साथ इस बार बिहार प्रशासन का व्यवहार और व्यवस्थाएं हमेशा याद रहेंगी।
18 साल की यात्रा में पहली बार दिखी ऐसी व्यवस्था
कौशांबी के ही रहने वाले शीतल प्रसाद ने बताया कि वे पिछले 18 वर्षों से लगातार सावन के महीने में जल उठाने बिहार आते रहे हैं। हालांकि, यह पहली बार है जब कांवरियों के आराम और सुख-सुविधाओं का इतना बारीक ध्यान रखा गया है। उन्होंने कहा कि सम्राट सरकार द्वारा किए गए इंतजामों के कारण इस बार लंबी और कठिन पैदल यात्रा काफी सुगम और आरामदायक बन गई है।
मेडिकल कैंप, पानी और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम
मध्य प्रदेश के सिंगरौली से दूसरी बार बाबा बैद्यनाथ के दर्शन करने आईं लालती देवी का कहना है कि बिहार के इंतजाम देखकर अब यहां से वापस जाने का मन ही नहीं कर रहा है। उन्होंने बताया कि पूरी कांवर यात्रा मार्ग में जगह-जगह स्वच्छ पेयजल, नाश्ते की व्यवस्था, सफाई, मेडिकल कैंप और रात्रिकालीन प्रकाश की शानदार व्यवस्था की गई है। महिला श्रद्धालुओं के लिए सुरक्षा के विशेष प्रबंध देखकर उन्होंने हर साल बिहार आने का संकल्प जताया।
आतिथ्य और प्रशासनिक मुस्तैदी की मिसाल
सावन के इस पावन अवसर पर सुल्तानगंज से देवघर के पूरे मार्ग को प्रशासनिक मुस्तैदी के साथ सजाया और सुरक्षित किया गया है। बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं को ‘देव तुल्य’ मानकर दी जा रही इन सुविधाओं ने न केवल कांवर यात्रा के शारीरिक कष्ट को कम किया है, बल्कि यह बिहार की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा और आतिथ्य का एक सशक्त उदाहरण बनकर सामने आया है।





