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अंतरिक्ष में भारत का नया सवेरा, आज लॉन्च होगा देश का पहला निजी ऑर्बिटल रॉकेट ‘विक्रम-1’

श्रीहरिकोटा (आंध्र प्रदेश): भारतीय अंतरिक्ष क्षेत्र के इतिहास में आज एक नया और बेहद महत्वपूर्ण अध्याय जुड़ने जा रहा है। देश में पहली बार, हैदराबाद स्थित निजी स्पेस स्टार्टअप ‘स्काईरूट एयरोस्पेस’ अपने पूरी तरह से स्वदेशी और निजी तौर पर विकसित ऑर्बिटल रॉकेट ‘विक्रम-1’ का

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श्रीहरिकोटा (आंध्र प्रदेश): भारतीय अंतरिक्ष क्षेत्र के इतिहास में आज एक नया और बेहद महत्वपूर्ण अध्याय जुड़ने जा रहा है। देश में पहली बार, हैदराबाद स्थित निजी स्पेस स्टार्टअप ‘स्काईरूट एयरोस्पेस’ अपने पूरी तरह से स्वदेशी और निजी तौर पर विकसित ऑर्बिटल रॉकेट ‘विक्रम-1’ का प्रक्षेपण करने जा रहा है। ‘मिशन आगमन’ नाम के इस ऐतिहासिक अभियान का प्रक्षेपण आज सुबह 11:30 बजे आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र के पहले लॉन्च पैड से किया जाएगा। भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डॉ. विक्रम साराभाई को सम्मान देते हुए इस शक्तिशाली रॉकेट का नाम ‘विक्रम-1’ रखा गया है।

यह भारत के वाणिज्यिक अंतरिक्ष इतिहास में पहला मौका होगा जब कोई निजी कंपनी स्वयं द्वारा डिजाइन और असेंबल किए गए लॉन्च व्हीकल के जरिए उपग्रहों (सैटेलाइट्स) को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करने का प्रयास करेगी। विक्रम-1 करीब सात मंजिला (24 मीटर) लंबा एक बहु-चरणीय ऑर्बिटल रॉकेट है, जिसे मुख्य रूप से छोटे उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजने के लिए तैयार किया गया है। इस रॉकेट की सबसे बड़ी खूबी इसका सुपर-लाइटवेट और बेहद मजबूत ‘ऑल-कार्बन-कॉम्पोजिट’ स्ट्रक्चर है। कार्बन फाइबर स्टील की तुलना में पांच गुना तक हल्का होता है, जिससे रॉकेट की पेलोड ले जाने की क्षमता और कार्यकुशलता काफी बढ़ जाती है। इसे 450 किलोमीटर की लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) में 350 किलोग्राम तक के उपग्रहों को सटीकता से स्थापित करने के लिए डिजाइन किया गया है।

तकनीकी रूप से यह रॉकेट बेहद आधुनिक है। इसमें भारत में पहली बार पूरी तरह से धातुओं से बने अत्याधुनिक ‘3डी-प्रिंटेड लिक्विड इंजन’ का इस्तेमाल किया गया है। इस तकनीक के जरिए सैकड़ों जटिल पुर्जों की जगह एक ही प्रिंटेड यूनिट तैयार की जाती है, जिससे रॉकेट निर्माण के समय और लागत दोनों में भारी कमी आती है। इसके साथ ही रॉकेट के शीर्ष पर एक ‘ऑर्बिटल एडजस्टमेंट मॉड्यूल’ लगाया गया है, जो एक ही मिशन में कई अलग-अलग उपग्रहों को उनकी निर्धारित कक्षाओं में स्थापित करने की क्षमता रखता है।

यह मिशन न सिर्फ वैज्ञानिक रूप से बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी बेहद खास है। ‘मिशन आगमन’ अपने साथ कई अनोखे पेलोड लेकर अंतरिक्ष जा रहा है, जिसमें बेंगलुरु की कंपनी कॉसमॉस डायमंड्स द्वारा लैब में तैयार ‘डायमंड लोटस’ (कॉस्मिक ब्लूम) शामिल है। इसके अलावा, माइक्रोआर्टिस्ट अजय कुमार मट्टेवाड़ा द्वारा 18 कैरेट सोने से बनाया गया एक अत्यंत सूक्ष्म रॉकेट भी अंतरिक्ष भेजा जा रहा है। चावल के दाने से भी छोटे इस सोने के रॉकेट के भीतर देश के तीन महान वैज्ञानिकों—सर सीवी रमन, डॉ. विक्रम साराभाई और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की सूक्ष्म मूर्तियां उकेरी गई हैं। इस ऐतिहासिक उड़ान के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का हस्तलिखित और ‘वंदे मातरम्’ लिखा एक पोस्टकार्ड भी अंतरिक्ष की यात्रा पर रवाना होगा।

इस ऐतिहासिक छलांग के पीछे केंद्र सरकार की ‘अंतरिक्ष नीति 2023’ का बड़ा योगदान है, जिसने निजी कंपनियों के लिए दरवाजे खोले। सरकार द्वारा शुरू की गई ‘इन-स्पेस सीड फंड’ योजना और 1,000 करोड़ रुपये के वेंचर कैपिटल फंड ने देश के स्पेस इकोसिस्टम को पूरी तरह बदल दिया है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि साल 2014 में देश के भीतर महज एक पंजीकृत स्पेस स्टार्टअप था, जो फरवरी 2026 तक बढ़कर 400 से भी अधिक हो चुका है। अब तक भारतीय स्पेस स्टार्टअप्स में 50 करोड़ डॉलर (500 मिलियन डॉलर) से ज्यादा का विदेशी व घरेलू निवेश आ चुका है। स्काईरूट एयरोस्पेस, पिक्सेल, अग्निकुल कॉसमॉस और ध्रुव स्पेस जैसी युवा कंपनियां आज भारत के इस नए और आत्मनिर्भर अंतरिक्ष युग की अगुवाई कर रही हैं।

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