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गंजेपन का ‘बदबूदार’ इलाज’! 500 साल पुरानी किताब में खौफनाक नुस्खे

Manchester (England): विज्ञान कितनी भी तरक्की कर ले, लेकिन हमारा इतिहास हमेशा हमें चौंकाता रहता है। हाल ही में यूनिवर्सिटी ऑफ मैनचेस्टर के वैज्ञानिकों को जॉन रायलैंड्स लाइब्रेरी में एक ऐसी किताब मिली है, जिसे पढ़कर आधुनिक डॉक्टरों का सिर चकरा जाए। 1531 के आसपास

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Manchester (England): विज्ञान कितनी भी तरक्की कर ले, लेकिन हमारा इतिहास हमेशा हमें चौंकाता रहता है। हाल ही में यूनिवर्सिटी ऑफ मैनचेस्टर के वैज्ञानिकों को जॉन रायलैंड्स लाइब्रेरी में एक ऐसी किताब मिली है, जिसे पढ़कर आधुनिक डॉक्टरों का सिर चकरा जाए। 1531 के आसपास की यह किताब यूरोप के पुनर्जागरण काल (Renaissance) की है और इसे नेत्र चिकित्सक बार्थोलोमाउस वोग्थेर ने लिखा था। इस किताब में दर्ज उपचार इतने अजीब हैं कि आप सोचने पर मजबूर हो जाएंगे कि उस दौर के लोग कैसे जिंदा रहते थे।

गंजेपन का ‘बदबूदार’ इलाज

आजकल लोग बाल झड़ने पर हेयर ट्रांसप्लांट या महंगे सीरम का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन 16वीं सदी में इसका इलाज बेहद घिनौना था। किताब में बताया गया है कि बालों को दोबारा उगाने के लिए सिर पर इंसानी मल (Human Feces) का लेप लगाने की सलाह दी जाती थी। लोगों का मानना था कि इससे सिर की ‘बीमारी’ खत्म हो जाएगी। इतना ही नहीं, बालों की मजबूती के लिए छिपकली के सिरों को पीसकर उसका मिश्रण बालों में लगाने का भी जिक्र है।

अजीबोगरीब नुस्खे: दालचीनी का धुआं और हिप्पो के दांत

किताब में सिर्फ बालों की ही बात नहीं है। सिर दर्द होने पर उस दौर के डॉक्टर तंबाकू के पाइप में दालचीनी भरकर पीने की सलाह देते थे। वहीं, दिल की धड़कन सामान्य रखने के लिए ‘अगर की लकड़ी’ का उपयोग बताया गया था। सबसे ज्यादा चौंकाने वाला उपचार मुंह के छालों का था, जिसके लिए दरियाई घोड़े (Hippopotamus) के दांतों का इस्तेमाल किया जाता था।

इतिहास की एक अनकही झलक

शोधकर्ताओं ने पाया कि इस किताब में कई तरह की हैंडराइटिंग है, जिससे पता चलता है कि समय के साथ कई वैद्यों ने इसमें अपने अनुभव जोड़े होंगे। हालांकि, यह साफ नहीं है कि ये नुस्खे कितने कारगर थे, लेकिन यह किताब बताती है कि जब आधुनिक दवाएं नहीं थीं, तब इंसान अपनी हताशा में किसी भी हद तक जाकर उपचार ढूंढता था। आज के हेयर ट्रांसप्लांट और लेजर ट्रीटमेंट के दौर में ये प्राचीन तरीके भले ही डरावने लगें, लेकिन ये चिकित्सा विज्ञान के क्रमिक विकास की एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं।

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