Lifestyle Adda: छोटे बच्चों और नवजात शिशुओं का रात में अचानक चौंककर जाग जाना या घबराकर रोने लगना एक आम समस्या है। यह स्थिति सिर्फ नवजात शिशुओं में ही नहीं, बल्कि एक साल या उससे अधिक उम्र के बच्चों में भी अक्सर देखने को मिलती है। कई बार दिनभर की गतिविधियां, अनजाने डर या कुछ खास परिस्थितियां बच्चों के कोमल मन पर गहरा असर छोड़ती हैं, जिससे वे नींद में असहज हो जाते हैं। ऐसे में अभिभावकों के लिए यह समझना बहुत जरूरी है कि बच्चे के इस डर की असली वजह क्या है और उन्हें कैसे सुरक्षित व शांत महसूस कराया जाए।
बुरे सपने और अंधेरे का डर
नवजात शिशु कई बार हल्की सी आवाज या असहजता से अचानक उठकर रोने लगते हैं। वहीं थोड़े बड़े बच्चे अपनी कल्पनाशीलता को नींद के जरिए सपनों के रूप में महसूस करते हैं। इनमें कई बार अच्छे सपने होते हैं तो कभी डरावने सपने बच्चों को विचलित कर देते हैं। इसके अलावा, बच्चों में सबसे आम डर अंधेरे का होता है। कई बार पैरेंट्स अपनी बात मनवाने या बच्चों को शांत कराने के लिए अंधेरे या ‘हौवा’ का डर दिखाते हैं, जो बिल्कुल गलत है। इससे बच्चे के मन में स्थायी भय बैठ जाता है और वे रात में बार-बार डरकर उठने लगते हैं।
बिजली की कड़कड़ाहट और तेज आवाजें
बारिश के मौसम में बादलों की गड़गड़ाहट और बिजली कड़कने की तेज आवाज से बच्चे अक्सर सहम जाते हैं। कई बच्चे तो तेज धमाके जैसी आवाज सुनते ही चीखने या रोने लगते हैं। ऐसी स्थिति में माता-पिता को तुरंत बच्चे को गले लगाना चाहिए और उसे प्यार से समझाना चाहिए कि यह केवल मौसम का असर है और डरने की कोई बात नहीं है। बच्चे को भावनात्मक सुरक्षा देना इस समय सबसे महत्वपूर्ण होता है।
अपरिचित लोगों और अकेलेपन से घबराहट
अक्सर देखा जाता है कि बच्चे उन चेहरों के साथ सुरक्षित और खुश रहते हैं जिन्हें वे रोज देखते हैं। जैसे ही कोई नया रिश्तेदार या बाहरी व्यक्ति सामने आता है, वे असहज होकर रोने लगते हैं। ऐसे में बच्चों पर तुरंत किसी की गोद में जाने का दबाव न बनाएं, बल्कि उन्हें घुलने-मिलने का थोड़ा समय दें। साथ ही, बच्चों को केवल माता-पिता पर ही पूरी तरह निर्भर न होने दें। उन्हें घर के अन्य सदस्यों जैसे दादा-दादी, चाचा-चाची के साथ भी वक्त बिताने दें, ताकि अलगाव की चिंता (सेपरेशन एंग्जायटी) कम हो और वे हर माहौल में सुरक्षित महसूस कर सकें।




