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Home»#Trending»जब झारखंड के वीर सपूत लाल सिंह मुंडा ने आदिवासी अस्मिता की रक्षा में दी अपने प्राणों की आहुति
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जब झारखंड के वीर सपूत लाल सिंह मुंडा ने आदिवासी अस्मिता की रक्षा में दी अपने प्राणों की आहुति

By Muzaffar HussainNovember 1, 20253 Mins Read
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East Singhbhum : झारखंड की धरती वीरों की भूमि रही है, जिसने अपने हक, अस्मिता और जंगल-जमीन की रक्षा के लिए अनगिनत बलिदान दिए हैं। इन्हीं वीर सपूतों में से एक थे लाल सिंह मुंडा, जिनकी गाथा आज भी पश्चिम सिंहभूम जिले के बंदगांव क्षेत्र में आदिवासी समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है। बंदगांव प्रखंड के टोकाद गांव में स्थित उनकी समाधि आज भी उनके अदम्य साहस और संघर्ष की याद दिलाती है।

लाल सिंह मुंडा का जन्म 28 मई 1946 को टिमडा गांव में हुआ था। बचपन से ही मेधावी और जुझारू स्वभाव के लाल सिंह ने सेंट जेवियर स्कूल, लुपुंगगुटु, चाईबासा से मैट्रिक और सेंट जेवियर कॉलेज, रांची से स्नातक की शिक्षा पूरी की थी। उन्होंने 1973 में जोसफीन बारला से विवाह किया और कुछ समय तक जमशेदपुर में शिक्षक के रूप में कार्य किया। लेकिन टीबी की बीमारी और आर्थिक कठिनाइयों के कारण उन्हें गांव लौटना पड़ा।

गांव लौटने के बाद उन्होंने जंगल-जमीन पर आदिवासियों के हक की लड़ाई का बीड़ा उठाया। वर्ष 1978 में शुरू हुए जंगल आंदोलन में उन्होंने मछुवा गागराई समेत अन्य साथियों के साथ मिलकर वन विभाग द्वारा खुंटकट्टी जमीन से आदिवासियों को बेदखल करने के खिलाफ आवाज उठाई। नकटी हाट मैदान से शुरू हुआ यह आंदोलन आगे चलकर एक बड़े जनआंदोलन का रूप ले लिया। इसी दौरान उनकी मुलाकात झारखंड आंदोलन के प्रणेता मेरो मुंडा और जॉन से हुई, जिन्होंने उनके राजनीतिक दृष्टिकोण को और सशक्त किया।

गुवा गोलीकांड (8 सितंबर 1980) के बाद जब आंदोलनकारियों पर पुलिसिया दमन बढ़ा, तो लाल सिंह मुंडा भी इसके शिकार बने। उनके घर पर कई बार छापेमारी हुई और घर कुर्क कर लिया गया। जेल में रहते हुए उन्होंने साथियों के साथ 84 घंटे की भूख हड़ताल की। इसके बाद भी उन्होंने संघर्ष का मार्ग नहीं छोड़ा।

1984 में सासनदिरी की जमीन पर मंदिर निर्माण के विरोध में उन्होंने खुलकर आवाज उठाई। उनका कहना था कि यह भूमि पूर्वजों की समाधि भूमि है, जिसे आदिवासी अस्मिता का प्रतीक स्थल माना जाता है। लगातार धमकियों के बावजूद वे डटे रहे। 1 नवम्बर 1984 को जब वे अपनी बीमार बहन से मिलने के बाद लौट रहे थे, तभी रास्ते में अपराधियों ने उन पर गोली चला दी, जिससे उनकी मौके पर ही मृत्यु हो गई।

आज टोकाद गांव स्थित उनका समाधि स्थल आदिवासी स्वाभिमान का प्रतीक बन चुका है। हर वर्ष लोग वहां एकत्र होकर उनके बलिदान को नमन करते हैं। लाल सिंह मुंडा का जीवन संदेश देता है कि जंगल, जमीन और अस्मिता की रक्षा के लिए दिया गया हर संघर्ष आने वाली पीढ़ियों को नई दिशा देता है।

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