Kaanur: केरल की राजनीति के ‘भीष्म पितामह’ कहे जाने वाले के. सुधाकरन और कांग्रेस के बीच दशकों पुराना रिश्ता टूटने की कगार पर है। विधानसभा चुनाव के लिए टिकट वितरण में अपनी मांगों की अनदेखी से आहत सुधाकरन ने अब स्वतंत्र रास्ता चुनने का फैसला किया है। बताया जा रहा है कि पार्टी आलाकमान से कई दौर की बातचीत विफल होने के बाद उन्होंने यह कड़ा कदम उठाया है। सुधाकरन आज दिल्ली में मीडिया के सामने अपने भविष्य की रणनीति का औपचारिक ऐलान कर सकते हैं।
कन्नूर के ‘शेर’ की नाराजगी का कारण
केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी (KPCC) के पूर्व अध्यक्ष और कांग्रेस वर्किंग कमेटी (CWC) के सदस्य रहे सुधाकरन का कद पार्टी में बहुत बड़ा रहा है। सूत्रों के मुताबिक, आगामी विधानसभा चुनाव में वे अपने समर्थकों और खुद के लिए कुछ विशेष सीटों की मांग कर रहे थे, जिस पर नेतृत्व ने चुप्पी साध ली। इसी उपेक्षा ने आग में घी का काम किया। अब चर्चा है कि वे कन्नूर विधानसभा सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनावी मैदान में उतर सकते हैं या अपनी नई क्षेत्रीय पार्टी का गठन कर सकते हैं।
कांग्रेस के लिए ‘खतरे की घंटी’
सुधाकरन का जाना कांग्रेस के लिए केवल एक नेता का जाना नहीं, बल्कि कन्नूर जैसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण गढ़ को खोने जैसा है। सीपीआई (एम) और मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के खिलाफ सबसे मुखर आवाज रहे सुधाकरन की पकड़ जमीन पर बेहद मजबूत है। वे चार बार विधायक और तीन बार लोकसभा सांसद रह चुके हैं। 2009, 2019 और अब 2024 में भी उन्होंने कन्नूर सीट पर कांग्रेस का परचम लहराया था।
राजनीतिक समीकरणों में बड़ा बदलाव
यदि सुधाकरन अलग होते हैं, तो केरल में यूडीएफ (UDF) के समीकरण पूरी तरह बिगड़ सकते हैं। उनके साथ कई जिला स्तरीय नेताओं के भी जाने की संभावना जताई जा रही है। अपनी आक्रामक शैली के लिए मशहूर सुधाकरन का अगला कदम क्या होगा, इस पर न केवल कांग्रेस बल्कि एलडीएफ (LDF) और बीजेपी की भी पैनी नजर टिकी है। केरल की सत्ता में वापसी का ख्वाब देख रही कांग्रेस के लिए यह ‘अपनों’ की बगावत सबसे बड़ी चुनौती बन गई है।
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