Paris, (France): फ्रांस जिस राफेल फाइटर जेट को दुनिया भर में ‘अमेरिकी प्रतिबंधों से मुक्त’ विमान बताकर बेचता था, उसी राफेल की नसों पर अब अमेरिका ने अपना नियंत्रण कायम कर लिया है। राफेल की सबसे बड़ी खूबी इसकी रणनीतिक स्वायत्तता थी, जिसे अब अमेरिकी कंपनी लोर (Lure) ग्रुप ने फ्रांस की कंपनी LMB फैंस और मोटर का अधिग्रहण कर तगड़ा झटका दिया है। यह सौदा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत जल्द ही 100 से ज्यादा नए राफेल विमानों का बड़ा ऑर्डर देने की तैयारी में है।

अंदरूनी पुर्जों पर अमेरिका का कब्ज़ा

एलएमबी (LMB) कोई साधारण कंपनी नहीं है। यह पिछले 60 सालों से राफेल जेट, फ्रांसीसी परमाणु पनडुब्बियों, टाइगर हेलिकॉप्टरों और यहां तक कि फ्रांस के इकलौते परमाणु एयरक्राफ्ट कैरियर ‘चार्ल्स डी गाले’ को उच्च क्षमता वाले फैंस और ब्रशलेस मोटर सप्लाई करती है। ये पुर्जे विमान की कूलिंग और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम के लिए दिल और फेफड़ों की तरह काम करते हैं। अब इस कंपनी का मालिकाना हक अमेरिका की न्यूयॉर्क स्थित लोर ग्रुप के पास चला गया है, जिसके लिए 43 करोड़ 30 लाख डॉलर की डील हुई है।

फ्रांस की संसद में संग्राम, सरकार की बेबसी

इस डील ने फ्रांस की राजनीति में दुर्लभ एकजुटता पैदा कर दी है। वामपंथी और दक्षिणपंथी दोनों दलों ने इसे फ्रांस की संप्रभुता का सौदा बताया है। विपक्षी दलों का आरोप है कि अमेरिका के डर से राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की सरकार ने इस डील को मंजूरी दी है। हालांकि, फ्रांस के वित्त मंत्रालय ने सफाई दी है कि उनके पास रणनीतिक फैसलों पर ‘वीटो’ का अधिकार होगा, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अब राफेल के निर्यात और अपग्रेड पर अमेरिकी प्रतिबंधों (ITAR) की छाया पड़ना तय है।

भारत और दुनिया पर क्या होगा असर?

तुर्की को F-35 प्रोग्राम से बाहर करना और कनाडा को स्वीडिश या फ्रांसीसी जेट न लेने की धमकी देना, डोनाल्ड ट्रंप की सख्त नीति का हिस्सा रहा है। भारत के लिए यह खबर चिंताजनक हो सकती है क्योंकि भारत ने राफेल को हमेशा इसलिए प्राथमिकता दी थी ताकि उसे रूस या अमेरिका की तरह किसी बाहरी दबाव का सामना न करना पड़े। अब जब राफेल की सप्लाई चेन में अमेरिका घुस चुका है, तो क्या भविष्य में राफेल की उड़ान वॉशिंगटन के इशारों पर होगी? यह एक बड़ा सवाल बन गया है।

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