Tehran, (Iran): अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चर्चा में रहे समझौते पर निर्धारित बैठक से पहले ही हस्ताक्षर किए जाने की खबर सामने आई है। दोनों देशों ने इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से इस समझौते को अंतिम रूप दिया है। हालांकि स्विट्जरलैंड में प्रस्तावित बैठक को लेकर ईरानी विदेश मंत्रालय की ओर से अनिश्चितता जताए जाने के बाद इस समझौते के भविष्य को लेकर कई सवाल भी उठने लगे हैं।

इस घटनाक्रम के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को लेकर महत्वपूर्ण बयान दिया है। फ्रांस में आयोजित जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान पत्रकारों से बातचीत में ट्रंप ने कहा कि यदि क्षेत्र के अन्य देशों के पास बैलिस्टिक मिसाइलें हैं तो ईरान के पास भी सीमित स्तर पर ऐसी मिसाइलें होना पूरी तरह असामान्य नहीं माना जा सकता।

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उन्होंने सऊदी अरब, कतर और अन्य देशों का उदाहरण देते हुए कहा कि विभिन्न देशों की सुरक्षा जरूरतें अलग-अलग होती हैं। हालांकि ट्रंप ने स्पष्ट किया कि अमेरिका किसी भी स्थिति में ईरान को परमाणु हथियार रखने की अनुमति नहीं देगा। उन्होंने मिसाइलों की संख्या या उनकी क्षमता पर संभावित सीमाओं को लेकर कोई स्पष्ट टिप्पणी नहीं की, जिससे उनके बयान की विभिन्न स्तरों पर व्याख्या की जा रही है।

खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी के संबंध में भी ट्रंप ने अपना रुख साफ किया। उन्होंने कहा कि अमेरिका फिलहाल इस क्षेत्र से अपनी सेना वापस नहीं बुलाएगा। उनके अनुसार क्षेत्रीय स्थिरता और सुरक्षा बनाए रखने के लिए अमेरिकी सैन्य उपस्थिति आवश्यक है। ऐसे समय में जब दोनों देशों के बीच तनाव कम करने के लिए कूटनीतिक प्रयास जारी हैं, यह बयान विशेष महत्व रखता है।

इसी दौरान ट्रंप प्रशासन ने अमेरिका की रक्षा तैयारियों को मजबूत करने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। ईरान से जुड़े बढ़ते तनाव और रक्षा जरूरतों को देखते हुए प्रशासन ने डिफेंस प्रोडक्शन एक्ट के उपयोग को मंजूरी दी है। इस कानून के तहत राष्ट्रपति निजी कंपनियों को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े उपकरणों और हथियारों का उत्पादन बढ़ाने का निर्देश दे सकते हैं।

राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि कुछ परिस्थितियां देश की रक्षा तैयारियों के लिए चुनौती बन सकती हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ को मिसाइल, गोला-बारूद और अन्य सैन्य उपकरणों के उत्पादन में तेजी लाने का निर्देश दिया गया है। प्रशासन का उद्देश्य सैन्य भंडार को मजबूत करना और भविष्य की संभावित सुरक्षा चुनौतियों के लिए पर्याप्त तैयारी सुनिश्चित करना है।

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अमेरिका और ईरान के बीच हुए इस समझौते, ट्रंप के बयानों और रक्षा उत्पादन बढ़ाने के फैसले ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई चर्चाओं को जन्म दिया है। अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले दिनों में दोनों देशों के संबंध किस दिशा में आगे बढ़ते हैं और क्षेत्रीय सुरक्षा पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है।

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