World News: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर अपनी ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति से वैश्विक मंच पर खलबली मचा दी है। ग्रीनलैंड को खरीदने की अपनी पुरानी इच्छा को दोहराने के साथ-साथ अब उन्होंने हिंद महासागर के रणनीतिक द्वीप दीएगो गार्सिया (Diego Garcia) को लेकर भी कड़ा रुख अपना लिया है। ट्रंप ने ब्रिटेन और मॉरीशस के बीच हुए उस ऐतिहासिक समझौते को ‘बड़ी मूर्खता’ करार दिया है, जिसके तहत चागोस द्वीप समूह की संप्रभुता मॉरीशस को सौंपी जानी है।
ब्रिटेन के समझौते पर ट्रंप का ‘प्रहार’
ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ’ पर ब्रिटेन की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि एक महत्वपूर्ण सैन्य अड्डे वाली जमीन को छोड़ना ‘पूर्ण कमजोरी’ है। उन्होंने चेतावनी दी कि चीन और रूस जैसी शक्तियां पश्चिम की इस कमजोरी का फायदा उठा सकती हैं। गौरतलब है कि मई 2025 में हुए समझौते के अनुसार, चागोस की संप्रभुता मॉरीशस को दी गई थी, जबकि दीएगो गार्सिया को 99 साल की लीज पर ब्रिटेन (और अमेरिकी सैन्य अड्डे) के पास रखने की बात तय हुई थी। ट्रंप अब इस पूरी योजना को रद्द करने के संकेत दे रहे हैं।
भारत के लिए क्यों बढ़ सकती है टेंशन?
दीएगो गार्सिया का मुद्दा भारत के लिए रणनीतिक और कूटनीतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील है:
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मॉरीशस का समर्थन: भारत हमेशा से मॉरीशस के उपनिवेशवाद विरोधी रुख का समर्थन करता रहा है और इस समझौते को अपनी बड़ी कूटनीतिक जीत मानता है।
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हिंद महासागर में प्रभुत्व: भारत इस क्षेत्र को अपना ‘प्रभाव क्षेत्र’ मानता है। ट्रंप का विस्तारवादी रुख यहां सैन्य अस्थिरता पैदा कर सकता है।
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चीन का डर: ट्रंप का तर्क है कि मॉरीशस को संप्रभुता देने से वहां चीन का प्रभाव बढ़ सकता है, जो भारत और अमेरिका दोनों के लिए सुरक्षा चिंता का विषय है।
कूटनीतिक यू-टर्न और भविष्य का संकट
दिलचस्प बात यह है कि ट्रंप प्रशासन ने पहले इस समझौते का समर्थन किया था, लेकिन अब ट्रंप ने पूरी तरह यू-टर्न ले लिया है। उन्होंने इसे ग्रीनलैंड हासिल करने की जरूरत से भी जोड़ दिया है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने इस समझौते का बचाव किया है, लेकिन ट्रंप के दबाव के बाद इस अंतरराष्ट्रीय संधि के भविष्य पर सवालिया निशान लग गए हैं। यदि ट्रंप इस समझौते को पलटते हैं, तो हिंद महासागर में भारत की रणनीतिक योजनाएं प्रभावित हो सकती हैं और क्षेत्र में नए सिरे से सैन्य प्रतिस्पर्धा शुरू हो सकती है।
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