New Delhi: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में मिली ऐतिहासिक हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सर्वोच्च नेता ममता बनर्जी की राजनीतिक मुश्किलें थमने का नाम नहीं ले रही हैं। पहले पार्टी के भीतर 60 विधायकों की खुली बगावत ने प्रदेश संगठन की जड़ें हिला दी थीं, वहीं अब राष्ट्रीय स्तर पर सांसदों के बीच भी भारी असंतोष और विद्रोह की चर्चाएं तेज हो गई हैं। राजनीतिक गलियारों और पुख्ता सूत्रों की मानें तो टीएमसी के करीब 20 सांसद इस वक्त भारतीय जनता पार्टी (BJP) के शीर्ष नेतृत्व के सीधे संपर्क में हैं और जल्द ही सामूहिक रूप से तृणमूल कांग्रेस छोड़ने की संभावनाओं पर विचार कर रहे हैं।
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ममता बनर्जी ने आम चुनावों के दौरान जो हुंकार भरी थी कि “बंगाल ही नहीं, दिल्ली से भी मोदी सरकार को बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा”, अब वही राजनीतिक दांव उन पर पूरी तरह उल्टा पड़ता दिखाई दे रहा है। बंगाल चुनाव में प्रचंड जीत हासिल करने के बाद भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व अब पूरी तरह आर-पार के मूड में आ गया है।
भाजपा आलाकमान के साथ चल रही है ‘हाई-लेवल’ बातचीत
सूत्रों का दावा है कि टीएमसी के इन असंतुष्ट सांसदों और भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के बीच उच्च स्तर पर गुप्त बातचीत का दौर अंतिम चरण में है। बताया जा रहा है कि लोकसभा और राज्यसभा के कई सांसदों ने टीएमसी की वर्तमान कार्यशैली से तंग आकर भाजपा का दामन थामने की स्पष्ट इच्छा जताई है। यदि यह राजनीतिक घटनाक्रम धरातल पर उतरता है, तो ममता बनर्जी को केवल पश्चिम बंगाल की क्षेत्रीय राजनीति में ही नहीं, बल्कि देश की संसद में भी बहुत बड़ा और असहनीय झटका लग सकता है।
संसद में टीएमसी की ताकत: कुल 41 सांसद
वर्तमान में देश की संसद में तृणमूल कांग्रेस एक बेहद मजबूत ताकत है, जिसके कुल 41 सांसद हैं। इनमें लोकसभा के 28 और राज्यसभा के 13 सदस्य शामिल हैं। राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी गठबंधन की राजनीति में टीएमसी हमेशा से अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती आई है और संसद के दोनों सदनों में उसे विपक्षी खेमे के प्रमुख स्तंभों में से एक माना जाता है। ऐसे में यदि 20 सांसदों की यह संभावित टूट हकीकत में बदलती है, तो यह पूरे विपक्षी कुनबे के लिए एक राष्ट्रीय चिंता का विषय बन जाएगी।
60 बागी विधायकों से पहले ही लग चुका है तगड़ा झटका
संसदीय संकट से ठीक पहले पश्चिम बंगाल विधानसभा के भीतर भी टीएमसी को मरणान्तक चोट लग चुकी है। पार्टी के 60 बागी विधायकों ने एकजुट होकर ऋतब्रत बनर्जी को अपना नया नेता चुन लिया था, जिसे विधानसभा अध्यक्ष ने सदन में मुख्य विपक्षी दल के रूप में आधिकारिक मंजूरी भी दे दी है। इस बागी गुट ने खुद को “असली तृणमूल” (Original TMC) घोषित करते हुए पूरी पार्टी और संगठन पर अपना कानूनी दावा ठोक दिया है।
भ्रष्टाचार और आरजी कर (RG Kar) मामले ने बढ़ाई नाराजगी
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस अभूतपूर्व चुनावी हार के बाद पार्टी के भीतर केंद्रीय नेतृत्व की तानाशाही, वित्तीय भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों और चर्चित ‘आरजी कर मेडिकल कॉलेज’ (RG Kar Case) कांड को लेकर आंतरिक असंतोष चरम पर पहुंच गया है। कई जमीनी नेता और जनप्रतिनिधि खुलकर ममता बनर्जी के कोर ग्रुप की कार्यशैली पर सार्वजनिक सवाल उठा चुके हैं।
पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, आने वाले दिनों में लोकसभा और राज्यसभा के भीतर भी इस बड़ी टूट की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। वर्तमान परिस्थितियों में ममता बनर्जी का पूरा ध्यान किसी भी तरह अपने बचे हुए सांसदों-विधायकों की एकजुटता बनाए रखने के साथ-साथ पार्टी का नाम और ‘जोड़ा फूल’ चुनाव चिह्न (Symbol) को कानूनी रूप से सुरक्षित रखने पर केंद्रित हो गया है। लगातार बढ़ते चौतरफा दबाव के बीच टीएमसी का शीर्ष नेतृत्व संगठन पर अपनी बची-खुची पकड़ मजबूत रखने की जद्दोजहद में जुटा हुआ है।



