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Home»#Trending»अरब संस्कृति का वह दौर, जिसने दुनिया को दीं बेजोड़ इमारतें
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अरब संस्कृति का वह दौर, जिसने दुनिया को दीं बेजोड़ इमारतें

जानें मस्जिद, मेहराब और ऐतिहासिक इमारतों का सफर
By Muzaffar HussainJune 23, 20266 Mins Read
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रांची: आज दुनिया भर में इस्लामिक वास्तुकला (Architecture) अपनी एक अलग और अनूठी पहचान रखती है। आलीशान इमारतें, आसमान छूती मीनारें और खूबसूरत नक्काशीदार मेहराब किसी भी देखने वाले को अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस भव्य कला की शुरुआत कहाँ से हुई थी? इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि अरब के ‘उमैय्यद काल’ (Umayyad Period) ने इस कलात्मक प्रगति में सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसी दौर में अरब सभ्यता ने वास्तुकला, काव्य, और संगीत के क्षेत्र में ऐसी तरक्की की, जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी। आइए विस्तार से जानते हैं कि इस काल में मस्जिद, मीनार, मेहराब और चित्रकला का विकास किस तरह हुआ।

मस्जिद अल अक्सा के बारे में 10 अद्भुत तथ्य | इस्लामी स्थलचिह्नइस्लामिक वास्तुकला का शुरुआती सफर और विदेशी प्रभाव

इतिहासकारों और विद्वानों का मानना है कि इस्लाम के उदय और उसकी शुरुआती जीतों से पहले, अरब के लोगों के पास वास्तुकला के क्षेत्र में कोई बहुत बड़ी या उल्लेखनीय उपलब्धि नहीं थी। प्रसिद्ध इतिहासकार ‘हिट्टी’ लिखते हैं कि उस दौर में जहाँ-जहाँ नखलिस्तान (Oasis) थे, वहाँ के लोग धूप में सुखाई गई मिट्टी की ईंटों, खजूर की लकड़ी और गारे की मदद से बेहद साधारण घर बनाया करते थे। यहाँ तक कि मक्का का पवित्र ‘काबा’, जो सभी मुसलमानों का सर्वोच्च तीर्थ स्थल है, वह भी शुरुआती दौर में बहुत साधारण था और उस पर छत तक नहीं थी।

मशहूर विद्वान ‘शुस्ती’ के अनुसार: “मुस्लिम स्थापत्य कला केवल अरबों या किसी एक अकेले देश की देन नहीं है, बल्कि इसका स्वरूप पूरी तरह से अंतर्राष्ट्रीय (International) है।”

जब उमैय्यद काल के दौरान अरब विजेताओं ने अलग-अलग देशों को जीता, तो वे वहाँ के बड़े शहरों में बनी खूबसूरत और भव्य इमारतों को देखकर हैरान रह गए। सीरिया और फिलिस्तीन के शानदार गिरजाघरों (Churches) और कलात्मक मंदिरों ने अरबवासियों को बहुत प्रभावित किया। यहीं से उनके मन में वैसी ही भव्य मस्जिदें और इमारतें बनाने की तीव्र इच्छा जागृत हुई। यही वजह है कि शुरुआती इस्लामिक वास्तुकला पर विदेशी शैलियों का साफ प्रभाव दिखाई देता है। धीरे-धीरे समय के साथ इसमें ईरानी, इराकी, मिस्री और अंदलुसी (स्पेनिश) शैलियों का समागम होता गया।

मस्जिदों का निर्माण और उनका बदलता स्वरूप

इस्लामिक वास्तुकला का सबसे पहला और बुनियादी रूप हमें मस्जिदों के निर्माण में देखने को मिलता है। इतिहास गवाह है कि इस्लाम की पहली मस्जिद का निर्माण खुद पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब ने करवाया था, जिसकी दीवारें कच्ची मिट्टी की थीं और बाद में उस पर खजूर के तनों से छत बनाई गई थी।

जैसे-जैसे साम्राज्य का विस्तार हुआ, वास्तुकला का स्तर भी बढ़ता गया:

  • बसरा की मस्जिद (637 ई.): अरबों द्वारा विजित प्रदेशों में पहली मस्जिद का निर्माण 637 ईस्वी में बसरा में ‘उताबा’ द्वारा करवाया गया था।

  • कूफा की मस्जिद (639 ई.): कूफा में ईंटों की दूसरी बड़ी मस्जिद बनी, जिसे बाद में ‘जियाद’ ने दोबारा बनवाया। इसमें लंबे खंभों का इस्तेमाल किया गया था।

  • दमिश्क की उमैय्यद मस्जिद (704 ई.): उमैय्यद वंश की राजधानी दमिश्क में खलीफा वलीद ने एक बेहद खूबसूरत और भव्य मस्जिद बनवाई। कहा जाता है कि इसे बनाने के लिए ईरान, भारत और बेजेंताइन (Byzantine) के कुशल कारीगरों को बुलाया गया था। इसकी दीवारें संगमरमर (Marble) की बनी थीं, जिन पर बेजोड़ कलात्मक नक्काशी की गई थी। आज भी यह मस्जिद दुनिया में स्थापत्य कला का एक अद्भुत नमूना मानी जाती है।

मेहराब, मकसूरा और मीनार की कहानी

मस्जिदों के भीतर दिखने वाले विशेष हिस्से जैसे मेहराब और मीनारें भी इसी दौर की देन हैं।

1. मेहराब (Mihrab)

मेहराब मस्जिद का वह हिस्सा होता है जिससे यह पता चलता है कि नमाज पढ़ते समय इबादतगाह के सामने का रुख (किबला) किस तरफ है। सबसे पहले इसका प्रयोग ‘मस्जिद-ए-नबवी’ में किया गया था। अली वलीद और उनके गवर्नर उमर इब्न अब्द अल-अजीज को इस्लामिक कला में मेहराब बनाने का श्रेय जाता है। देखते ही देखते यह हर मस्जिद की एक अनिवार्य विशेषता बन गया।

2. मकसूरा (Maqsura)

यह मस्जिद के भीतर एक खास जंगला या घेरा होता था। इसके अंदर खड़े होकर खलीफा सुरक्षित रूप से भाषण (खुतबा) दिया करते थे और जरूरत पड़ने पर आराम भी करते थे। इतिहासकारों के अनुसार, सबसे पहले खलीफा मुआविया ने सुरक्षा के दृष्टिकोण से मस्जिदों में मकसूरा का निर्माण करवाया था।

3. मीनार (Minaret)

मस्जिदों में ऊंची मीनारें बनाने की शुरुआत भी उमैय्यद काल में ही हुई। मुआविया के गवर्नर जियाद ने इराक के ‘जामा-ए-बसरा’ में पत्थर की पहली मीनार बनवाई थी। इसके बाद खलीफा वलीद ने सीरिया और हिजाज की मस्जिदों में खूबसूरत मीनारें बनवाईं। इन मीनारों पर भी विदेशी कला का प्रभाव साफ झलकता है।

कुब्बत-उस-सखरा और मस्जिद-ए-अक्सा

Dome of the rock (Qubbat al Sakhra) Painting by Muhammad Suleman Rehman | Saatchi Art Norwayजेरूसलम (यरूशलेम) मुस्लिमों के सबसे पवित्र स्थलों में से एक है। मान्यताओं के अनुसार, यहीं से पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब आसमान (मेराज की यात्रा) पर गए थे। इसी पवित्र स्थान पर खलीफा उमर ने एक मस्जिद बनवाई थी।

बाद में खलीफा अब्दुल मलिक ने इस जगह पर एक ऐसी भव्य इमारत बनाने का फैसला किया, जो उस समय के बड़े-बड़े गिरजाघरों से भी ज्यादा खूबसूरत हो। इसी सोच के साथ 691 ई. में जेरूसलम में ‘कुब्बत-उस-सखरा’ (Dome of the Rock) का निर्माण हुआ। यह इमारत अपनी नक्काशी और दीवारों पर बने बेल-बूटों के चित्रों के कारण दुनिया भर में प्रसिद्ध हुई। इसके ठीक पास अब्दुल मलिक ने ‘मस्जिद-ए-अक्सा’ का भी निर्माण कराया, जो उस दौर की सबसे विशाल इमारतों में से एक मानी जाती है।

महल और अन्य ऐतिहासिक इमारतें

धार्मिक स्थलों के अलावा उमैय्यद काल के शाहजादों और खलीफाओं ने कई आलीशान महलों का भी निर्माण कराया। अमीर मुआविया, हज्जाज और अब्दुल मलिक द्वारा बनवाए गए कई महलों के अवशेष आज भले ही पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं, लेकिन सीरिया की सीमा पर कुछ खंडहर आज भी उस दौर की गवाही देते हैं।

खलीफा वलीद द्वारा 712 ई. के आसपास बनवाए गए ‘कैसरे आमरा’ (Qusayr ‘Amra) महल के अवशेष आज भी मौजूद हैं। इस महल की सबसे बड़ी खासियत इसकी दीवारों पर की गई विचित्र और अनोखी चित्रकारी है, जो उस दौर के वैभव को दर्शाती है।

इस्लामिक चित्रकला: धार्मिक मान्यताएं और विकास

इस्लाम में जीवित प्राणियों की हुबहू चित्रकारी या मूर्ति बनाने को धार्मिक रूप से वर्जित माना गया है। पैगंबर मोहम्मद साहब के कथनों के अनुसार, कयामत के दिन सबसे कड़ी सजा चित्रकारों (बनावटी रूप देने वालों) को मिलने की बात कही गई है। यही कारण है कि किसी भी पारंपरिक मस्जिद या मुस्लिम धार्मिक स्थलों पर इंसानों या जानवरों के चित्र नहीं दिखाई देते।

इसके विकल्प के तौर पर मुस्लिम कलाकारों ने प्राकृतिक सुंदरता को चुना। मस्जिदों की दीवारों को सजाने के लिए केवल फूल-पत्ती, पेड़-पौधे, प्राकृतिक वनस्पतियां और ज्यामितीय रेखाचित्रों (Geometric Patterns) का उपयोग किया जाने लगा। हालांकि, उमैय्यद काल में बाहरी दुनिया के संपर्क में आने से गैर-धार्मिक इमारतों में चित्रकला का भी थोड़ा विकास हुआ। इसका सबसे बड़ा उदाहरण ‘कैसरे आमरा’ की दीवारों पर बनी नक्काशी और खलीफाओं के हम्माम (स्नानगृह) हैं, जहाँ तत्कालीन छह राजाओं व खलीफाओं के सुंदर चित्र देखने को मिलते हैं।

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