World News: बांग्लादेश की राजनीति आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। पूर्व प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया के निधन के बाद उनके बड़े बेटे और बीएनपी (BNP) के कार्यकारी अध्यक्ष तारिक रहमान 17 साल का वनवास काटकर वतन लौट आए हैं। ढाका की सड़कों पर उनका स्वागत किसी भावी प्रधानमंत्री की तरह हो रहा है। लेकिन इस सियासी हलचल के बीच, बांग्लादेश का एक बड़ा तबका उनके छोटे भाई अराफात रहमान कोको को भी याद कर रहा है। जहां तारिक ने सत्ता के कांटों भरे ताज को चुना, वहीं कोको ने अपना जीवन बांग्लादेशी क्रिकेट की जड़ें मजबूत करने में खपा दिया।

क्रिकेट के ‘मूक नायक’ थे अराफात रहमान कोको

सत्ता के सबसे ताकतवर परिवार का हिस्सा होने के बावजूद अराफात रहमान कोको ने कभी राजनीति की ओर मुड़कर नहीं देखा। उनका जुनून मैदान पर था। 2001 में बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड (BCB) की डेवलपमेंट कमेटी के चेयरमैन के रूप में उन्होंने वह नींव रखी, जिस पर आज बांग्लादेशी क्रिकेट खड़ा है। शाकिब अल हसन, मुशफिकुर रहीम और तमीम इकबाल जैसे दिग्गजों को तराशने का श्रेय कोको की दूरदर्शी सोच को ही जाता है। उनके नेतृत्व में ही 2004 के अंडर-19 वर्ल्ड कप का सफल आयोजन हुआ और मीरपुर का शेर-ए-बांग्ला स्टेडियम आधुनिक रूप में सामने आया।

बीपीएल (BPL) का विचार और कोको का विजन

आज जिस ‘बांग्लादेश प्रीमियर लीग’ (BPL) की धूम पूरी दुनिया में है, उसका बीज कोको ने ही 2003 में बोया था। उन्होंने खिलाड़ियों के लिए पेशेवर कोच, फिजियो और बॉलिंग मशीन जैसी सुविधाएं मुहैया कराईं, जो उस वक्त बांग्लादेशी क्रिकेट के लिए एक सपना थीं। उनके क्लब ‘ओल्ड डीओएचएस’ ने अपने पहले ही सीजन में खिताब जीतकर सनसनी मचा दी थी। क्रिकेट पंडितों का मानना है कि यदि कोको सक्रिय न होते, तो शायद बांग्लादेश को क्रिकेट के वैश्विक मानचित्र पर आने में दशकों लग जाते।

विवादों का साया और असमय विदाई

हालांकि, कोको का जीवन केवल खेल तक सीमित नहीं रहा। राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के कारण 2007 में उन्हें अपनी मां के साथ जेल जाना पड़ा। मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों और गिरते स्वास्थ्य के कारण वे निर्वासन में चले गए। साल 2015 में मलेशिया में महज 45 वर्ष की आयु में दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया।

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आज जब तारिक रहमान फरवरी 2026 के चुनावों के जरिए अपनी मां की राजनीतिक विरासत संभालने जा रहे हैं, तब देश को कोको की वह ‘निस्वार्थ सेवा’ याद आ रही है। बांग्लादेशी जनता देख रही है कि कैसे एक भाई सत्ता की राह पर संघर्ष कर रहा है, जबकि दूसरा भाई खेल के मैदान पर अपनी अमिट छाप छोड़कर इतिहास का हिस्सा बन चुका है।

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