Health Desk: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में तनाव, अनिद्रा और नशे का सीधा प्रहार हमारे पेट पर हो रहा है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, जब हमारे दिमाग में नकारात्मक विचार आते हैं, तो उनका सीधा असर हमारी आंतों की कार्यप्रणाली पर पड़ता है। इससे न केवल कब्ज की शिकायत होती है, बल्कि पेटदर्द भी बना रहता है। इस समस्या को मेडिकल भाषा में ‘इरिटेबल बाउल सिंड्रोम’ यानी IBS कहा जाता है। यह पाचन तंत्र से जुड़ी एक ऐसी आम समस्या है, जिसकी सबसे बड़ी वजह मस्तिष्क की कार्यप्रणाली का प्रभावित होना है।
जब व्यक्ति गहरी नींद में होता है, तब उसे इन लक्षणों का अहसास नहीं होता, लेकिन जागते ही तनाव के कारण आंतों का संतुलन बिगड़ने लगता है। आयुर्वेद में इस स्थिति को ‘ग्रहणी दोष’ कहा जाता है। इसमें जठराग्नि के गड़बड़ाने से व्यक्ति के मन में वहम बैठ जाता है और वह खुद को गंभीर रोगी मानने लगता है। IBS के प्रमुख लक्षणों में पेट में ऐंठन, दस्त, खट्टी डकारें, जी मिचलाना और बार-बार मल त्याग की इच्छा होना शामिल है। गंभीर मामलों में मरीज को बुखार और खून की कमी भी हो सकती है।
खान-पान में बदलाव है जरूरी
इस बीमारी से निपटने के लिए भोजन पर विशेष नियंत्रण आवश्यक है। डाइट में पुराने चावल, लौकी, तुरई, मूंग की दाल, अनार, लस्सी, धनिया और पुदीना जैसी हल्की चीजों को शामिल करना चाहिए। वहीं, मक्के की रोटी, राजमा, प्याज, बेसन और तली-भुनी चीजों से परहेज करना बेहतर है। IBS के कारण कभी-कभी अप्रत्यक्ष रूप से सिरदर्द, कमरदर्द और जोड़ों में दर्द भी हो सकता है, जिसकी मुख्य वजह एसिडिटी होती है।
इलाज और बचाव के उपाय
IBS का इलाज लक्षणों के आधार पर किया जाता है। कई बार ‘प्लेसिबो तकनीक’ के जरिए मरीज की दिमागी कार्यप्रणाली को सुचारू करने की कोशिश की जाती है। शरीर में पानी की कमी होने पर इंट्रावेनस फ्लूड दिया जाता है। आयुर्वेद के अनुसार, कच्चे बेल का चूर्ण और भुने जीरे वाली छाछ पीना रामबाण साबित होता है। साथ ही ब्राह्मी, शंखपुष्पी और अश्वगंधा जैसी जड़ी-बूटियां मानसिक शांति प्रदान करती हैं।
तनाव से बचने के लिए नियमित योग, शवासन और प्राणायाम का सहारा लें। चाय, कॉफी और शराब जैसे कैफीन व नशे वाले पदार्थों से दूरी बनाएं। दिनभर में कम से कम 8 से 9 गिलास पानी पिएं और फाइबर युक्त फल जैसे सेब व केला खाएं। अगर मानसिक तनाव अवसाद का रूप ले रहा है, तो अपनों से बात साझा करने में संकोच न करें।
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