Chaibasa News: झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले का नोआमुंडी इन दिनों एक अनोखे बदलाव की वजह से चर्चा में है। खनन क्षेत्र के रूप में पहचान रखने वाला यह इलाका अब राज्य का पहला ऐसा प्रशासनिक खंड बन गया है, जहाँ हर पात्र दिव्यांग व्यक्ति की पहचान की गई, उनका प्रमाणन हुआ और उन्हें सरकारी योजनाओं से जोड़ा गया। यह उपलब्धि सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए सम्मान की वापसी है जो अब तक सिस्टम की नजरों से लगभग गायब थे।
सबल कार्यक्रम बना बदलाव की असली ताकत
21 प्रकार की दिव्यांगता पर प्रशिक्षण और डिजिटल ट्रैकिंग
स्थानीय आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को दिव्यांगता के सभी 21 प्रकार पहचानने का प्रशिक्षण दिया गया। एक डिजिटल ऐप के जरिए हर व्यक्ति की वास्तविक समय की जानकारी दर्ज की गई, ताकि कोई भी रिकॉर्ड से बाहर न रहे। पंचायतों और प्रशासनिक विभागों को भी प्रक्रिया में शामिल किया गया। इसी का परिणाम रहा कि कुछ महीनों में नोआमुंडी ने 100% दिव्यांग पहचान और प्रमाणीकरण का कीर्तिमान बनाया।
केवल पहचान नहीं—अजीविका और आत्मनिर्भरता पर भी जोर
यह उपलब्धि सिर्फ प्रमाण पत्र देने पर नहीं रुकी। अब तक 292 दिव्यांग लोगों को आजीविका से जुड़ी योजनाओं से जोड़ा गया है। इसमें कौशल प्रशिक्षण, छोटे उद्यमों की शुरुआत और रोजगार के अवसर शामिल हैं। यही नहीं, सहायक तकनीक ने उनकी दिनचर्या में नई स्वतंत्रता जोड़ी है।
IIT दिल्ली की AssistTech लैब के सहयोग से चल रही ‘ज्योतिर्गमय’ पहल के तहत कई दृष्टिबाधित लोग आज डिजिटल सेवाओं, बैंकिंग और पढ़ने–लिखने में खुद को सक्षम महसूस कर रहे हैं।
समावेशन का मॉडल, जो राज्य सीमाओं से आगे बढ़ा
नोआमुंडी ने साबित किया है कि समावेशन कोई दान नहीं, यह व्यवस्था का दायित्व है। जब प्रशासन “हर किसी को देखने” की मानसिकता अपनाता है, तो समुदाय भी बदलने लगता है। इसी वजह से यह मॉडल अब झारखंड के कई जिलों और ओडिशा में भी विस्तार पा रहा है।
नोआमुंडी की यह कहानी बताती है कि विकास तभी सच्चा होता है जब हर व्यक्ति उसके दायरे में आए—किसी को भी अदृश्य न छोड़ा जाए।



