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Tehran, Iran: मध्य पूर्व के आसमान में मंडराते लड़ाकू विमानों और बरसती मिसाइलों के बीच अब असली लड़ाई ‘यूरेनियम’ के इर्द-गिर्द सिमट गई है। रणनीतिक विशेषज्ञों का दावा है कि अमेरिका और इजरायल का अंतिम लक्ष्य ईरान के परमाणु कार्यक्रम को हमेशा के लिए दफन करना है। लेकिन ताजा सैन्य आकलन बताते हैं कि ईरान ने अपने यूरेनियम भंडार को इस्फाहान (Isfahan) जैसी जगहों पर पहाड़ों के नीचे बने एक जटिल टनल नेटवर्क में इतनी गहराई में छिपाया है, जहां सामान्य बम पहुंच ही नहीं सकते।
सिर्फ हवाई हमला नहीं, चाहिए विशाल जमीनी फौज
नाटो (NATO) के पूर्व कमांडरों और सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, इतने संवेदनशील रेडियोधर्मी पदार्थ को बाहर निकालने के लिए केवल बमबारी काफी नहीं होगी। इसके लिए जमीन पर हजारों सैनिकों को उतारना होगा, जो मलबे के नीचे बिछी बारूदी सुरंगों (Mines) और ‘बूबी ट्रैप्स’ को साफ करते हुए खुदाई कर सकें। इस पूरे ऑपरेशन के लिए युद्ध के मैदान में ही एक अस्थायी एयरफील्ड या रनवे बनाना होगा, ताकि बरामद यूरेनियम को तुरंत सुरक्षित बाहर निकाला जा सके। इस दौरान अमेरिकी और इजरायली सेना को ईरान के ‘आत्मघाती ड्रोन’ और मिसाइल हमलों के घेरे में रहकर काम करना होगा।
10 परमाणु बमों जितना मसाला
अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले साल तक ईरान के पास लगभग 440 किलोग्राम 60 प्रतिशत समृद्ध यूरेनियम था। जानकारों का कहना है कि इतने भंडार से कम से कम दस परमाणु बम तैयार किए जा सकते हैं। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने हाल ही में माना कि उनके परमाणु केंद्रों पर हमले हुए हैं और काफी हिस्सा मलबे में दब गया है, लेकिन उन्होंने साफ कर दिया कि ईरान किसी भी दबाव में झुककर अपने परमाणु भविष्य पर बात नहीं करेगा।
ट्रंप का ‘प्लान-ईरान’ और वैश्विक चिंता
28 फरवरी से शुरू हुई यह सीधी सैन्य जंग अब कूटनीति के दायरे से बाहर निकल चुकी है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि फिलहाल उनका ध्यान ईरान की मिसाइल क्षमता और ड्रोन नेटवर्क को कुचलने पर है, लेकिन वे परमाणु भंडार को जब्त करने की संभावना को खारिज नहीं कर रहे हैं। इस खूनी संघर्ष ने पूरी दुनिया को परमाणु युद्ध की दहलीज पर खड़ा कर दिया है, जहां एक छोटी सी गलती महाविनाश का कारण बन सकती है।
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