London, (England): इंग्लैंड के प्रसिद्ध शेरवुड वन में स्थित करीब 1200 वर्ष पुराना ऐतिहासिक ‘मेजर ओक’ पेड़ अब जीवित नहीं रहा। सदियों से ब्रिटिश इतिहास, लोककथाओं और प्राकृतिक विरासत का प्रतीक माना जाने वाला यह विशाल वृक्ष लंबे समय से पर्यटकों और इतिहास प्रेमियों के आकर्षण का केंद्र था। मान्यता है कि लोकनायक रॉबिन हुड और उनके साथियों ने इसी पेड़ की आड़ में शरण ली थी।

पक्षी संरक्षण संस्था रॉयल सोसाइटी फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ बर्ड्स (RSPB) ने पुष्टि की है कि इस वर्ष वसंत ऋतु में मेजर ओक पर नई पत्तियां नहीं आईं। विशेषज्ञों के निरीक्षण के बाद इसे मृत घोषित कर दिया गया। हालांकि यह ऐतिहासिक पेड़ अपने मूल स्थान पर ही रहेगा और आगे भी शेरवुड वन की पहचान बना रहेगा।

पर्यटकों की आवाजाही और जड़ों पर बढ़ा दबाव

विशेषज्ञों के अनुसार पिछले दो सौ वर्षों में लाखों लोग इस ऐतिहासिक वृक्ष को देखने पहुंचे। लगातार बढ़ती पर्यटक गतिविधियों के कारण इसके आसपास की मिट्टी अत्यधिक सख्त हो गई, जिससे वर्षा का पानी जड़ों तक पर्याप्त मात्रा में नहीं पहुंच पाया। नतीजतन जड़ों को जरूरी नमी और पोषक तत्व नहीं मिल सके और समय के साथ पेड़ कमजोर होता गया।

जांच में यह भी सामने आया कि जड़ों के आसपास की मिट्टी के अत्यधिक दबाव ने उनके प्राकृतिक विकास को प्रभावित किया, जिससे वृक्ष की स्थिति लगातार बिगड़ती चली गई।

जलवायु परिवर्तन ने भी बढ़ाई मुश्किल

पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन ने भी मेजर ओक की स्थिति को और गंभीर बना दिया। हाल के वर्षों में ब्रिटेन में बढ़ती गर्मी, बार-बार पड़ने वाली हीटवेव और सूखे जैसी परिस्थितियों ने प्राचीन वृक्षों पर अतिरिक्त दबाव डाला। अधिक उम्र वाले पेड़ ऐसे मौसमीय बदलावों के प्रति ज्यादा संवेदनशील होते हैं और मेजर ओक भी इससे अछूता नहीं रहा।

संरक्षण के प्रयास भी नहीं आए काम

इस ऐतिहासिक वृक्ष को सुरक्षित रखने के लिए वर्षों से कई उपाय किए गए थे। इसकी विशाल शाखाओं को सहारा देने के लिए लोहे के खंभे और स्टील के केबल लगाए गए थे। वहीं 1970 के दशक में पेड़ के चारों ओर सुरक्षा घेरा भी बनाया गया, ताकि पर्यटक बहुत करीब न पहुंच सकें।

इसके बावजूद प्राकृतिक कारणों और मानवीय दबाव के संयुक्त प्रभाव के कारण इस ऐतिहासिक वृक्ष को बचाया नहीं जा सका। 18वीं शताब्दी के अंत से प्रसिद्धि पाने वाला मेजर ओक आज भी रॉबिन हुड की लोककथाओं के कारण सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि भले ही यह पेड़ अब जीवित नहीं है, लेकिन इसकी लकड़ी और संरचना भविष्य में भी वन के पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा बनी रहेगी और कई जीवों को आश्रय व पोषण उपलब्ध कराती रहेगी।

Share.
Exit mobile version