रांची। सुबह के ठीक साढ़े छह बजे थे। रांची के अल्बर्ट एक्का चौक पर अमूमन दिखने वाली रोजमर्रा की भागदौड़ आज थमी हुई थी। हवा में भीगी हुई मिट्टी और मोगरे की हल्की खुशबू घुली थी। जैसे ही मस्जिद के लाउडस्पीकर से ‘अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर’ की पवित्र सदाएं गूंजीं, वैसे ही राजधानी के विभिन्न इलाकों से सफेद कुर्ता-पायजामा और नक्काशीदार टोपियां पहने नमाज़ियों के कदम ईदगाहों की तरफ बढ़ने लगे।
रांची के मेन रोड स्थित जामा मस्जिद, डोरंडा ईदगाह और कडरू ईदगाह मैदान में अकीदतमंदों (श्रद्धालुओं) का हुजूम उमड़ पड़ा था। हर चेहरे पर एक विशेष चमक थी और दिलों में त्याग व समर्पण का भाव।
इबादत के झुके सिर और अमन की दुआ
डोरंडा ईदगाह में कतारें इतनी लंबी थीं कि मैदान छोटा पड़ गया, और लोगों ने सड़क पर ही सफें (कतारें) बिछा लीं। जैसे ही इमाम साहब ने नमाज़ शुरू कराई, हजारों सिर एक साथ खुदा की बारगाह में झुक गए। वह दृश्य अद्भुत था—जहाँ अमीर-गरीब, ऊंच-नीच का हर फासला मिट चुका था। कंधे से कंधा मिलाकर खड़े लोग सिर्फ एक ही सुर में अमन-चैन की दुआ कर रहे थे।
नमाज़ खत्म होते ही जैसे ही इमाम साहब ने ‘अस्सलामू अलैकुम व रहमतुल्लाह’ कहकर दुआ मुकम्मल की, पूरा माहौल “ईद मुबारक” की सदाओं से गूंज उठा। इसके बाद शुरू हुआ गले मिलने का सिलसिला। दोस्त-दोस्त से, भाई-भाई से और बड़े-बुजुर्ग बच्चों को गले लगाकर दुआएं देने लगे। इस गले मिलने में केवल औपचारिकता नहीं थी, बल्कि इसमें एक साल का इंतजार, शिकवे-शिकायतों को भुला देने की चाहत और आपसी मोहब्बत का अहसास था।
बाज़ारों की रौनक और घरों में पकवानों की महक
नमाज़ खत्म होने के बाद शहर का मिजाज पूरी तरह उत्सव के रंग में रंग गया। रांची के मेन रोड, हिंदपीढ़ी, और डोरंडा के बाज़ारों में अचानक चहल-पहल बढ़ गई। बच्चे हाथ में गुब्बारे और खिलौने लिए चहक रहे थे।
घरों में सुबह से ही तैयारियों का दौर चल रहा था। जैसे ही पुरुष नमाज़ पढ़कर लौटे, किचनों से सेंवई और लज़ीज़ पकवानों की खुशबू पूरे मोहल्ले में तैरने लगी। बकरीद का त्योहार मुख्य रूप से हज़रत इब्राहिम की कुर्बानी की याद में मनाया जाता है, इसलिए इस दिन सुन्नत-ए-इब्राहिमी के तहत कुर्बानी का सिलसिला शुरू हुआ।
बकरीद का असली संदेश
इस त्योहार का उद्देश्य केवल प्रतीक स्वरूप कुर्बानी देना नहीं है, बल्कि अपने भीतर के अहंकार, स्वार्थ और बुराई को त्यागना है। साथ ही, इस दिन गरीबों और जरूरतमंदों का विशेष ख्याल रखा जाता है, ताकि समाज का कोई भी व्यक्ति इस खुशी से महरूम न रहे।
गंगा-जमुनी तहज़ीब की मिसाल
रांची की इस बकरीद में जो सबसे खूबसूरत तस्वीर देखने को मिली, वह थी यहाँ की ‘गंगा-जमुनी तहज़ीब’। हिंदपीढ़ी और कडरू के इलाकों में सुबह से ही गैर-मुस्लिम भाई अपने मुस्लिम दोस्तों के घरों के बाहर बधाई देने के लिए खड़े नजर आए।
अल्बर्ट एक्का चौक के पास रहने वाले राहुल ने अपने बचपन के दोस्त इमरान को गले लगाकर ईद की मुबारकबाद दी। राहुल ने हंसते हुए कहा, “नमाज़ खत्म होने का इंतज़ार तो मुझे इमरान से ज़्यादा था, क्योंकि मुझे पता है कि इसके बाद चाची के हाथ की बनी लज़ीज़ मटन बिरयानी और किमामी सेंवई मिलने वाली है।” यह सिर्फ राहुल और इमरान की कहानी नहीं थी, बल्कि रांची के कोने-कोने में आज यही नजारा था। धर्म की दीवारें ढह चुकी थीं और केवल इंसानियत और दोस्ती का जश्न मनाया जा रहा था।
प्रशासन की मुस्तैदी और शांतिपूर्ण समापन
त्योहार को शांतिपूर्ण और सुरक्षित माहौल में संपन्न कराने के लिए रांची जिला प्रशासन और पुलिस बल सुबह से ही पूरी तरह मुस्तैद दिखे। संवेदनशील चौराहों पर सीसीटीवी कैमरे और ड्रोन के जरिए निगरानी रखी जा रही थी। शांति समिति के सदस्य और स्थानीय युवा भी जगह-जगह पर ट्रैफिक संभालने और नमाज़ियों की सहूलियत के लिए तैनात थे।
दोपहर होते-होते रांची की सड़कें रंगों, मुस्कुराहटों और त्योहार के उल्लास से सराबोर हो जायेंगीं। सोशल मीडिया पर भी रांची ट्रेंड कर रहा है, जहाँ लोग एक-दूसरे को डिजिटल बधाइयां भेज रहे हैं। शाम होते-होते दावतों का दौर शुरू हो जायेगा, जहाँ हर घर के दरवाजे हर किसी के लिए खुले मिलेंगे।
रांची ने एक बार फिर साबित कर दिया कि त्योहार चाहे कोई भी हो, जब उसे मिलकर मनाया जाता है, तो उसकी रौनक दोगुनी हो जाती है। बकरीद की यह शाम रांची के इतिहास में आपसी भाईचारे की एक और खूबसूरत इबारत लिख गई।



