Ranchi: झारखंड की दो राज्यसभा सीटों के लिए हुए चुनाव के नतीजों ने सत्तारूढ़ इंडिया गठबंधन के भीतर मौजूद मतभेदों को खुलकर सामने ला दिया है। विधानसभा में पर्याप्त संख्या बल होने के बावजूद कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा को हार का सामना करना पड़ा, जबकि भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नथवानी ने जीत दर्ज कर राजनीतिक समीकरणों को नया मोड़ दे दिया।

81 सदस्यीय झारखंड विधानसभा में इंडिया गठबंधन के पास 56 विधायकों का समर्थन था। गणित के अनुसार गठबंधन दोनों सीटों पर जीत दर्ज कर सकता था, लेकिन परिणाम में केवल झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के उम्मीदवार बैजनाथ राम ही विजयी हो सके। कांग्रेस उम्मीदवार की हार ने गठबंधन की एकजुटता और अंदरूनी तालमेल पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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हार के बाद कांग्रेस ने अपने सहयोगी दलों राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) और सीपीआई (माले) पर निशाना साधा है। झारखंड कांग्रेस प्रभारी के. राजू ने दावा किया कि कांग्रेस के सभी 16 विधायक एकजुट थे और उन्हें जेएमएम के चार अतिरिक्त वोट भी मिले। उनके अनुसार कांग्रेस उम्मीदवार को कुल 20 वोट प्राप्त हुए, जबकि आरजेडी और माले के विधायकों ने अपेक्षित समर्थन नहीं दिया। कांग्रेस विधायक दीपिका पांडेय सिंह ने भी सहयोगी दलों से अपना पक्ष स्पष्ट करने की मांग की। उन्होंने कहा कि यदि महागठबंधन की मजबूती का दावा किया जा रहा है तो यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार को पूरा समर्थन क्यों नहीं मिला।

हालांकि राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि कांग्रेस की हार का कारण केवल आरजेडी और माले नहीं हैं। चर्चा इस बात की भी है कि जेएमएम की रणनीति ने चुनावी समीकरणों को प्रभावित किया। बताया जा रहा है कि जेएमएम ने अपने उम्मीदवार बैजनाथ राम के लिए आवश्यक 28 वोटों के मुकाबले 30 वोट सुनिश्चित किए, जिससे कांग्रेस के लिए उपलब्ध संभावित वोटों की संख्या कम हो गई। विश्लेषकों का मानना है कि यदि जेएमएम के पास दो अतिरिक्त वोट नहीं जाते तो कांग्रेस की स्थिति कुछ अलग हो सकती थी। इसी कारण अब गठबंधन के भीतर जेएमएम की भूमिका को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। हालांकि इस संबंध में जेएमएम की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

दूसरी ओर आरजेडी और माले नेताओं ने गठबंधन धर्म निभाने का दावा किया है। उनका कहना है कि कांग्रेस को हार के कारणों की तलाश पहले अपने भीतर करनी चाहिए। दोनों दलों का मानना है कि पूरी जिम्मेदारी सहयोगियों पर डालना उचित नहीं है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार यह चुनाव केवल राज्यसभा की दो सीटों का मुकाबला नहीं था, बल्कि गठबंधन की आंतरिक मजबूती की भी परीक्षा थी। परिणाम ने साफ कर दिया है कि गठबंधन के भीतर समन्वय और रणनीतिक एकरूपता की कमी मौजूद है।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि राज्यसभा चुनाव के बाद पैदा हुई यह खटास भविष्य में इंडिया गठबंधन की राजनीति को किस दिशा में ले जाएगी। आने वाले महीनों में झारखंड की राजनीति में इसके असर और नए समीकरण देखने को मिल सकते हैं।

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