Ranchi: देश में ईवीएम (EVM) की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने वाली कांग्रेस और विपक्षी पार्टियों के लिए झारखंड के नगर निकाय चुनाव के नतीजे किसी बड़े झटके से कम नहीं हैं। लंबे समय से बैलेट पेपर से चुनाव कराने की वकालत कर रहे इंडिया गठबंधन को उन्हीं की रणनीति ने आईना दिखा दिया है। झारखंड की सभी 48 नगर निकायों में इस बार मतदान बैलेट पेपर के जरिए हुआ था, लेकिन परिणामों ने साबित कर दिया कि चुनावी हार-जीत का आधार मशीन नहीं, बल्कि जनाधार होता है।

भाजपा का मजबूत प्रदर्शन, कांग्रेस पीछे

हालांकि झारखंड के ये निकाय चुनाव गैर-दलीय (बिना आधिकारिक सिंबल) आधार पर लड़े गए थे, लेकिन सभी प्रमुख दलों ने अपने-अपने उम्मीदवारों को खुला समर्थन दिया था। नतीजों के विश्लेषण के अनुसार:

  • भाजपा: पार्टी समर्थित उम्मीदवारों ने 48 में से 12 महत्वपूर्ण सीटों पर जीत दर्ज कर शहरी क्षेत्रों में अपना दबदबा साबित किया। रांची नगर निगम में भाजपा समर्थित रोशनी खलखो ने बड़ी जीत हासिल की।

  • झामुमो (JMM): सत्ताधारी दल के समर्थित प्रत्याशियों को 6 सीटों पर संतोष करना पड़ा।

  • कांग्रेस: सबसे बुरा हाल कांग्रेस का रहा, जिसके समर्थित केवल 2 उम्मीदवार ही जीत सके।

  • निर्दलीय: कई नगर पालिकाओं और नगर पंचायतों में निर्दलीय उम्मीदवारों ने बाजी मारकर बड़े दलों के समीकरण बिगाड़ दिए।

कर्नाटक सरकार के लिए ‘सच्चाई का सामना’

झारखंड के इन नतीजों ने दक्षिण भारत की राजनीति में भी हलचल पैदा कर दी है। हाल ही में कर्नाटक की सिद्दारमैया सरकार ने आगामी पंचायत चुनावों में बैलेट पेपर और बैलेट बॉक्स के इस्तेमाल को मंजूरी दी थी। कांग्रेस का तर्क था कि इससे पारदर्शिता बढ़ेगी। लेकिन अब झारखंड के परिणामों ने यह संदेश दिया है कि बैलेट पेपर लागू करना विपक्ष की जीत की गारंटी नहीं है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है कि क्या कर्नाटक कांग्रेस के भीतर उठ रहे विरोध के स्वर अब और तेज होंगे और क्या सरकार अपने फैसले पर दोबारा विचार करेगी?

ईवीएम नैरेटिव को लगा धक्का

विपक्ष अक्सर आरोप लगाता रहा है कि भाजपा केवल ईवीएम में ‘गड़बड़ी’ की वजह से चुनाव जीतती है। झारखंड में बैलेट पेपर से हुए चुनाव में भाजपा की जीत ने इस नैरेटिव को कड़ी चुनौती दी है। जानकारों का मानना है कि अब विपक्ष को हार के लिए मशीनों को दोष देने के बजाय अपनी सांगठनिक कमजोरी और जमीनी रणनीति पर मंथन करना होगा।

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