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दवा खाकर सदन पहुँचे जयराम महतो : 16 लाख प्रवासी मजदूरों का उठाया मुद्दा

रांची: झारखंड विधानसभा के बजट सत्र के दसवें दिन मंगलवार को सदन का माहौल उस समय भावुक और आक्रामक हो गया, जब श्रम, नियोजन और उद्योग विभाग की अनुदान मांगों पर चर्चा शुरू हुई। इस दौरान डुमरी विधायक जयराम महतो और डाल्टनगंज विधायक आलोक कुमार

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रांची: झारखंड विधानसभा के बजट सत्र के दसवें दिन मंगलवार को सदन का माहौल उस समय भावुक और आक्रामक हो गया, जब श्रम, नियोजन और उद्योग विभाग की अनुदान मांगों पर चर्चा शुरू हुई। इस दौरान डुमरी विधायक जयराम महतो और डाल्टनगंज विधायक आलोक कुमार चौरसिया ने सरकार की नीतियों को आईना दिखाते हुए राज्य के युवाओं और मजदूरों की वास्तविक स्थिति पेश की।

बीमार होने के बावजूद डटे रहे जयराम महतो

सदन में चर्चा का केंद्र रहे टाइगर जयराम महतो, जो खराब स्वास्थ्य के बावजूद दवा खाकर सदन पहुंचे। उन्होंने विधानसभा की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि विधायकों को सवाल देर रात के बजाय वक्त पर मिलने चाहिए ताकि वे बेहतर तैयारी कर सकें। महतो ने एक क्रांतिकारी सुझाव देते हुए कहा कि राज्य के हर दिहाड़ी मजदूर, रेहड़ी-पटरी वाले और टेंपो चालक के लिए ‘यूनिक वर्कर आईडी’ सिस्टम लागू होना चाहिए। इससे उन्हें सीधे तौर पर बीमा, पीएफ और ईएसआई जैसी सामाजिक सुरक्षा मिल सकेगी। उन्होंने विभाग के आंकड़ों को चुनौती देते हुए दावा किया कि राज्य के 16 लाख से अधिक युवा पलायन कर बाहर काम कर रहे हैं, जिनकी सुरक्षा का कोई पुख्ता इंतजाम नहीं है।

बंद खदानें और पलायन का दंश

वहीं, विधायक आलोक कुमार चौरसिया ने कटौती प्रस्ताव का समर्थन करते हुए पलामू और गढ़वा की स्थिति पर चिंता जताई। उन्होंने तीखा प्रहार करते हुए कहा कि सरकार ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ की बातें तो करती है, लेकिन असलियत में उद्यमी रंगदारी और भ्रष्टाचार से परेशान हैं। चौरसिया ने सुझाव दिया कि यदि पलामू की सोकरा, कैमरा और तलतवा जैसी बंद पड़ी खदानों को फिर से चालू कर दिया जाए, तो हजारों स्थानीय युवाओं को अपने घर में ही रोजगार मिल जाएगा और उन्हें दूसरे राज्यों में जाकर अपमानित नहीं होना पड़ेगा।

वादों की कसौटी पर सरकार

विपक्ष ने सरकार को उनके चुनावी वादों की याद दिलाई, जिसमें हर साल लाखों नौकरियां और बेरोजगारी भत्ता देने की बात कही गई थी। विधायकों ने आरोप लगाया कि आईटीआई संस्थानों की हालत जर्जर है और कौशल विकास के नाम पर केवल खानापूर्ति हो रही है। साथ ही, गर्मी के दस्तक देते ही पेयजल संकट और खराब चापाकालों का मुद्दा भी सदन में उठा, जिससे यह साफ हुआ कि विकास की योजनाएं धरातल पर उतरने के बजाय फाइलों में ही सिमट कर रह गई हैं।

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