Jerusalem, (Israel): इजरायल की राजनीति में इस समय भारी उथल-पुथल मची हुई है। जेरुसलम स्थित इजरायली संसद ‘नेसेट’ (Knesset) को तय समय से पहले भंग करने के प्रस्ताव पर होने वाली वोटिंग से पहले वहां का राजनीतिक माहौल बेहद गर्म हो गया है। संसद परिसर के बाहर और भीतर, दोनों ही जगह राजनीतिक खींचतान और तनाव साफ दिखाई दे रहा है। यह पूरा घटनाक्रम सीधे तौर पर प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की दक्षिणपंथी गठबंधन सरकार के अस्तित्व और भविष्य से जुड़ा हुआ है।

संसद में बढ़ता दबाव और विपक्ष का रुख

इजरायल के विपक्षी दल इस नए प्रस्ताव को नेतन्याहू सरकार की कमजोरी और उनके प्रति जनता के बढ़ते असंतोष का सीधा संकेत बता रहे हैं। विपक्ष का दावा है कि सरकार देश को संभालने में पूरी तरह विफल रही है। दूसरी ओर, प्रधानमंत्री नेतन्याहू के सहयोगी दलों का तर्क है कि समय से पहले संसद को भंग करने का यह कदम देश में गंभीर राजनीतिक अस्थिरता पैदा करेगा और इजरायल को जबरन नए चुनावों की ओर धकेल देगा। हालांकि, संसद भंग करने का यह विधेयक अभी कई कानूनी और संसदीय चरणों से गुजरना है, इसलिए अंतिम फैसला तुरंत सामने नहीं आएगा।

सैन्य सेवा छूट विवाद है इस संकट की जड़

इस पूरे राजनीतिक संकट की मुख्य जड़ इजरायल के अति-रूढ़िवादी (Ultra-Orthodox) धार्मिक छात्रों को अनिवार्य सैन्य सेवा से छूट देने वाला विवादित मसला है। इस कानून को लेकर नेतन्याहू के सत्ताधारी गठबंधन के भीतर ही गहरी नाराजगी और दोफाड़ की स्थिति पैदा हो गई है। गठबंधन में शामिल अति-रूढ़िवादी पार्टियां लगातार धमकी दे रही हैं कि अगर उनकी धार्मिक मांगें पूरी नहीं की गईं, तो वे सरकार के खिलाफ जाकर संसद भंग करने के पक्ष में मतदान कर देंगी। यही वजह है कि इस समय नेसेट के भीतर दिया जाने वाला हर बयान और हर एक वोट सरकार के लिए जीवन-मरण का प्रश्न बन गया है।

जनता की बेचैनी और आगे की तस्वीर

संसद के बाहर दोनों पक्षों के राजनेता मीडिया के सामने अपने-अपने रुख को सही ठहराने में जुटे हैं, जबकि समर्थकों और विरोधियों दोनों ही खेमों में बेचैनी चरम पर है। विश्लेषकों का मानना है कि यह सिर्फ एक सामान्य संसदीय प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह इजरायली राजनीति की भावी दिशा और दशा तय करने वाला ऐतिहासिक क्षण है। यदि यह प्रस्ताव संसद में आगे बढ़ जाता है, तो आने वाले कुछ ही हफ्तों या महीनों में इजरायल को फिर से आम चुनाव की प्रक्रिया से गुजरना पड़ सकता है।

नेसेट की यह वोटिंग प्रधानमंत्री नेतन्याहू की राजनीतिक सूझबूझ के लिए एक लिटमस टेस्ट (अग्निपरीक्षा) की तरह है। अगर सहयोगी दलों के बीच समय रहते कोई लिखित समझौता नहीं हुआ, तो जेरुसलम की राजनीतिक हवा और तेज हो सकती है, जिससे सत्ता के वर्तमान समीकरण पूरी तरह बदलने की संभावना है।

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