World News: मिडिल ईस्ट में बीते कुछ हफ्तों से चल रहे तनाव और युद्ध के बाद भले ही संघर्ष थम गया हो, लेकिन ईरान अब भी सतर्क है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा 24 जून को घोषित किए गए संघर्षविराम (सीजफायर) पर ईरान को कोई भरोसा नहीं है। तेहरान का कहना है कि उन्हें अमेरिका की मंशा और इजरायल की नीयत पर शक है, और यदि दुबारा हमला हुआ, तो वे जवाबी कार्रवाई को पूरी तरह तैयार हैं।

युद्ध विराम पर ईरान की शंका

ईरान के सशस्त्र बलों के प्रमुख अब्दुल रहीम मौसावी ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि वे अमेरिका और इजरायल की प्रतिबद्धता पर भरोसा नहीं करते। एक सैन्य बयान में उन्होंने कहा, “हम युद्धविराम की घोषणा का सम्मान करते हैं, लेकिन हम इस पर आंख मूंदकर विश्वास नहीं कर सकते। दुश्मनों की पिछली कार्रवाइयों और धोखाधड़ी को देखते हुए हमें सतर्क रहना होगा।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, मौसावी ने सऊदी अरब के रक्षा मंत्री खालिद बिन सलमान से टेलीफोन पर बातचीत के दौरान यह बयान दिया। उन्होंने कहा कि यदि दुश्मन (यानी इजरायल या अमेरिका) की ओर से फिर कोई आक्रमण होता है, तो ईरान उसका कड़ा और निर्णायक जवाब देगा।

ट्रंप की शांति की अपील और परमाणु निरीक्षण का मुद्दा

संघर्षविराम की घोषणा करते हुए डोनाल्ड ट्रंप ने उम्मीद जताई थी कि ईरान अब अपने परमाणु कार्यक्रम को फिर से शुरू नहीं करेगा, और वह अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण के लिए तैयार रहेगा। व्हाइट हाउस में प्रेस वार्ता के दौरान जब उनसे पूछा गया कि क्या वह ईरान से अंतरराष्ट्रीय परमाणु एजेंसी (IAEA) को पूरी छूट देने की मांग करेंगे, तो ट्रंप ने कहा, “ईरान को या तो अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों को सहयोग देना होगा, या फिर हमारे जैसे साझेदारों के साथ मिलकर पारदर्शिता दिखानी होगी।

हालांकि, ट्रंप की इस बात पर भी तेहरान की ओर से फिलहाल कोई सकारात्मक संकेत नहीं आया है। ईरान पहले भी कह चुका है कि वह अपनी संप्रभुता से समझौता नहीं करेगा और किसी भी निरीक्षण की सीमाएं तय होंगी।

क्यों नहीं कर पा रहा ईरान भरोसा?

ईरान का विश्वास न करने का बड़ा कारण यह है कि अमेरिका ने पूर्व में कई बार संझौतों को तोड़ा है, जैसे कि 2015 के ईरान न्यूक्लियर डील (JCPOA) से ट्रंप प्रशासन का एकतरफा बाहर निकलना। इसके बाद से ईरान ने लगातार अमेरिका की भूमिका को संदेह की नजर से देखा है।

ईरानी अधिकारियों का मानना है कि मौजूदा सीजफायर सिर्फ एक रणनीतिक कदम है, जिससे इजरायल को पुनर्गठन का समय मिल सके। वे आशंका जता रहे हैं कि जब भी परिस्थितियां अनुकूल होंगी, हमला दोबारा हो सकता है।

क्षेत्रीय तनाव का असर

मध्य-पूर्व (मिडिल ईस्ट) का यह तनाव सिर्फ ईरान-इजरायल तक सीमित नहीं है। लेबनान, सीरिया, सऊदी अरब और यमन जैसे पड़ोसी देशों पर भी इसका असर पड़ा है। सऊदी रक्षा मंत्री के साथ ईरान की बातचीत इस दिशा में एक सकारात्मक संकेत माना जा सकता है कि क्षेत्रीय देशों के बीच शांति बनाए रखने का प्रयास जारी है।

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