World News: ईरान की संसद ने सोमवार को एक ऐतिहासिक फैसला लेते हुए अपनी राष्ट्रीय मुद्रा ‘रियाल’ से चार शून्य हटाने का बिल पास कर दिया। इसका मतलब है कि अब 10,000 पुराने रियाल के बदले एक नया रियाल चलेगा। यह बदलाव सिर्फ मुद्रा के अंकों का नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था की दशा सुधारने का प्रयास माना जा रहा है।
सरकारी मीडिया के अनुसार, इस बदलाव को लागू करने के लिए सेंट्रल बैंक को दो साल की तैयारी का समय दिया गया है। इसके बाद तीन साल की संक्रमण अवधि होगी जिसमें पुराने और नए दोनों नोट एक साथ चलेंगे। बैंकिंग प्रणाली, भुगतान प्रणाली और नकदी लेनदेन को नए रियाल के अनुसार अपडेट किया जाएगा।
क्यों उठाया गया यह कदम
ईरान की अर्थव्यवस्था बीते कई वर्षों से गंभीर संकट में है। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से ही रियाल कमजोर होता जा रहा है। आज स्थिति यह है कि एक अमेरिकी डॉलर खरीदने के लिए लगभग 11,50,000 रियाल देने पड़ते हैं। यानी, एक रोटी खरीदने के लिए लाखों के नोट गिनने की नौबत आती है। महंगाई कई वर्षों से 35 से 40 प्रतिशत के बीच बनी हुई है।
अमेरिका और पश्चिमी देशों की पाबंदियों ने ईरान की परेशानियां और बढ़ा दी हैं। तेल निर्यात पर बैन लगने से विदेशी मुद्रा भंडार घट गया है। चीन के अलावा कोई देश ईरान से तेल नहीं खरीदता। वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि तेल निर्यात बंद होने से सरकारी राजस्व में भारी गिरावट आई, जिससे महंगाई लगातार ऊंची रही।
वहीं, देश में राजनीतिक अलगाव, विदेशी निवेश की कमी और आयात पर बढ़ती निर्भरता ने भी रियाल को और कमजोर कर दिया। परिणामस्वरूप, करेंसी की कीमत इतनी गिरी कि वह कागज से भी सस्ती हो गई।
क्या शून्य हटाने से कुछ बदलेगा?
आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम प्रतीकात्मक है, न कि तुरंत लाभदायक। इससे लेनदेन में आसानी जरूर होगी—नोटों की गिनती और लेखा-जोखा सरल हो जाएगा। परंतु महंगाई या बेरोजगारी जैसी मूल समस्याएं तब तक खत्म नहीं होंगी जब तक उत्पादन, निर्यात और विदेशी निवेश नहीं बढ़ते।
ईरान सरकार का मानना है कि यह सुधार अर्थव्यवस्था को मनोवैज्ञानिक मजबूती देगा और मुद्रा में लोगों का भरोसा फिर से बहाल करेगा।
दूसरे देशों के अनुभव
ईरान अकेला देश नहीं जिसने ऐसा किया हो।
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2018 में वेनेजुएला ने भी पांच शून्य हटाए, पर महंगाई अब भी नियंत्रित नहीं हुई।
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जिम्बाब्वे में 2000 के दशक में 10 खरब डॉलर के नोट से शून्य हटाने पड़े, फिर भी व्यवस्था नहीं सुधरी।
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वहीं, 2005 में तुर्की ने छह शून्य हटाकर नया लिरा जारी किया और धीरे-धीरे स्थिरता हासिल की।
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ब्राजील ने 1994 में ‘रियाल योजना’ शुरू की थी, जिससे महंगाई पर काबू पाया गया।
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घाना में 2007 में ऐसा प्रयास हुआ, लेकिन विदेशी निवेश पर मिला-जुला असर रहा।
जनता की प्रतिक्रिया
सोशल मीडिया पर ईरानियों की प्रतिक्रियाएं मिली-जुली हैं। एक यूजर ने लिखा—“रियाल कागज से भी सस्ता था, अब केवल नाम बदल गया।” वहीं, दूसरे ने तंज कसा—“मुद्रा बदलना आसान है, लेकिन लोगों की निराशा कैसे बदलेंगे?”
लोगों का कहना है कि उनकी क्रय शक्ति लगातार घट रही है और अब 80 प्रतिशत आबादी अपनी आमदनी का अधिकांश हिस्सा सिर्फ ज़रूरी चीजों पर खर्च कर रही है।
आखिरकार, नया रियाल ईरान की अर्थव्यवस्था को कितना संभाल पाएगा, यह आने वाले कुछ सालों में स्पष्ट होगा। लेकिन इतना तय है कि यह कदम ईरान के आर्थिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है।



