India News: राजनीति और कूटनीति की दुनिया में कहा जाता है कि न कोई स्थायी दोस्त होता है और न ही स्थायी दुश्मन। भारत और चीन के रिश्तों में भी कुछ ऐसा ही बदलाव देखने को मिल रहा है। जिस ड्रैगन से गलवान घाटी में भिड़ंत के बाद हमने दूरी बना ली थी, अब उसी के लिए सरकारी ठेकों के दरवाजे फिर से खोलने की तैयारी चल रही है। सूत्र बता रहे हैं कि वित्त मंत्रालय उस योजना पर काम कर रहा है, जिससे चीनी कंपनियों पर लगी पांच साल पुरानी पाबंदियां खत्म हो सकती हैं।

ट्रंप का ‘टैरिफ वॉर’ और भारत की नई चाल?

इस बड़े बदलाव के पीछे अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का भी हाथ माना जा रहा है। ट्रंप द्वारा भारतीय सामानों पर भारी टैरिफ लगाने और पाकिस्तान की ओर झुकाव दिखाने के बाद, नई दिल्ली ने अपनी रणनीति बदल दी है। सात साल बाद प्रधानमंत्री मोदी के चीन दौरे ने इस दोस्ती की बुनियाद रखी। अब सीधी उड़ानें शुरू हो रही हैं और चीनी पेशेवरों के लिए वीजा प्रक्रिया भी आसान कर दी गई है।

पाबंदियों से भारत को फायदे की जगह हुआ नुकसान?

सरकारी गलियारों में यह चर्चा आम है कि 2020 में लगाई गई पाबंदियों ने भारत के कई बड़े प्रोजेक्ट्स को लटका दिया। उदाहरण के तौर पर, रेल मंत्रालय की एक बड़ी परियोजना से चीनी कंपनी को बाहर करने के बाद काम में देरी हुई और लागत भी बढ़ गई। कई विभागों ने केंद्र सरकार से शिकायत की है कि चीनी कंपनियों को हटाने से बाजार में प्रतिस्पर्धा कम हो गई, जिससे भारतीय प्रोजेक्ट्स महंगे और सुस्त हो गए हैं। इसी ‘कमी और देरी’ को दूर करने के लिए अब चीनी कंपनियों को वापस बुलाने का मन बनाया जा रहा है।

पीएमओ की मुहर का है इंतजार?

हालांकि, यह इतना आसान भी नहीं है। भले ही वित्त मंत्रालय पाबंदियां हटाने के पक्ष में हो, लेकिन आखिरी फैसला प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) को ही लेना है। सुरक्षा एजेंसियां अभी भी सतर्क हैं, इसलिए विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) पर फिलहाल कड़े नियम जारी रह सकते हैं। लेकिन अगर यह प्रस्ताव पास होता है, तो भारत के कंस्ट्रक्शन, टेक और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में चीनी कंपनियों की धमक फिर से सुनाई देगी।

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